भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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३६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् दूसरे भाव में भौम, बारहवें भाव में गुरु, पाँचवें भाव में शुक्र हों, दाहयुक्त वा दृष्ट हों तो स्त्रीशाप से पुत्र का अभाव होता है।।८७।। नाशस्थौ वित्तदारेशौ पुत्रलग्ने कुजे शनौ। कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः ।।८८।। आठवें भाव में धनेश, सप्तमेश हों, पाँचवें और लग्न में भौम-शनि हों तथा कारक पापयुक्त हो तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता है।।८८।। लग्नपञ्चमभाग्यस्था राहुमन्दकुजाः क्रमात्। रन्ध्रस्थौ पुत्रदारेशौ पत्नीशापात्सुतक्षयः ।।८९।। लग्न पंचम, नवम में राहु, शनि, भौम हों और आठवें भाव में पंचमेश, सप्तमेश हों तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता है।।८९।। अस्य शान्तिमाह- तस्य दोषस्य शान्त्यर्थं कन्यादानं समाचरेत्। लक्ष्मीनारायणं देयं सर्वाभरणभूषितम् ।।९०।। इस दोष के शान्त्यर्थ कन्यादान करे। लक्ष्मीनारायण की मूर्त्ति सभी आभरणों से युक्त।।९०।। मूर्त्तिदानं च कर्त्तव्यं दशधेनूः प्रदापयेत्। शय्यां च भूषणं चैव दम्पत्योर्दापयेत्सुधीः। पुत्रं प्रसूयते तस्य भाग्यवृद्धिश्च जायते ।।९१।। दान करे, दश धेनु का दान करें, शय्या-आभूषण सपत्नीक ब्राह्मण को दे। ऐसा करने से पुत्र होता है तथा भाग्यवृद्धि भी होती है।।९१।। प्रेतशापात्सुतक्षययोगः- मन्त्रशापमिदं मर्त्यः पिशाचं बाध्यते सदा। कर्मलोपं पितृभ्यश्च तच्छापाद्वंशनाशनम् ।।९२।। जब पितरों के कर्म का लोप होता है अर्थात् उनके श्राद्धादि ठीक से नहीं होते हैं तो पिशाच (प्रेत) हो जाते हैं तथा वे वंशवृद्धि को नहीं होने देते।।९२।। पुत्रस्थितौ मन्दसूर्यौ क्षीणचन्द्रस्तु संप्तमे। लग्ने व्यये राहुजीवौ प्रेतशापात्सुतक्षयः ।।९३।।