बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्न में शनि, पाँचवें भाव में राहु, आठवें भाव में सूर्य युक्त हो और बारहवें भाव में भौम हो तो प्रेतशाप से वंश का अभाव होता है॥१००॥ कामस्थानाधिपे दुःस्थे पुत्रे चन्द्रसमन्विते। मन्दमान्दियुते लग्ने प्रेतशापात्सुतक्षयः॥१०१॥ सप्तमेश ६, ८, १२ भाव में भौम हो, पाँचवें भाव में चन्द्रमा हो, लग्न में शनि और गुलिक हो तो प्रेतशाप से संतान का अभाव होता है॥१०१॥ बाधास्थानाधिपे पुत्रे शनिशुक्रसमन्विते। कारके नाशशशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः॥१०२॥ अष्टमेश शनि-शुक्र से युत होकर पाँचवें भाव में हो और कारक आठवें भाव में हो तो प्रेतशाप से संतान का अभाव होता है॥१०२॥ अस्य शान्तिमाह- तद्दोषस्य शान्त्यर्थं विष्णुश्राद्धं समाचरेत्। रुद्राभिषेकं कुर्वीत ब्रह्ममूर्तिं प्रदापयेत्॥१०३॥ उपर्युक्त प्रेतशाप के निवृत्त्यर्थ विष्णुपद (गया) में श्राद्ध करना चाहिए और रुद्राभिषेक करके ब्रह्म की मूर्ति का दान॥१०३॥ धेनुं रजतपात्रं च नीलं चैव प्रदापयेत्। एतत्कर्मकृते तत्र शापमोक्षः प्रजायते॥१०४॥ तथा धेनु तथा चाँदी के पात्र और नीलमणि का दान करना चाहिए। इतने कर्मों के करने से मुक्ति हो जाती है और कुलवृद्धि होती है॥१०४॥ अथ बहुपुत्रयोगः- पुत्रे राहुरविः सौम्याः कारके शुभसंयुते। शुभेन वीक्षिते वापि बहुपुत्रं समादिशेत्॥१०५॥ पंचम भाव में राहु, सूर्य, बुध हों, कारक (गुरु) शुभग्रह से युत हो और शुभग्रह से देखा जाता हो तो बहुत-से पुत्र होते हैं॥१०५॥ पुत्रेशे शुभराशिस्थे शुभदृष्टिसमन्विते। कारके केन्द्रभावस्थे बहुपुत्रं समादिशेत्॥१०६॥ पंचमेश शुभग्रह की राशि में शुभग्रह की दृष्टि से युक्त हो, कारक केन्द्र में हो तो बहुत पुत्र होते हैं॥१०६॥