भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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लग्नाध्यायः ३९ लग्न को शुद्ध करना चाहिए। अर्थात् लग्न का अंश और प्राणपद का अंश समान होना चाहिए।।७।। विना प्राणपदाच्छुद्धो गुलिकाद्वा निशाकराद्। तदशुद्धं विजानीयात्स्थावराणां तदेव हि।।८।। जो जन्मलग्न प्राणपद या गुलिक या चन्द्रमा से शुद्ध न की गई हो वह अशुद्ध होती है और वह स्थावर की जन्मलग्न होती है।।८।। द्वयोर्हीनबलेऽप्येवं गुलिकात्परिचिन्तयेत्। तस्मात्तत्सप्तमस्थात्तदंशाच्च कलत्रतः।।९।। इसलिए उससे सप्तम से या उसके अंश से लग्न का संशोधन करना चाहिए। दोनों निर्बल हों तो गुलिक (माँदी) विचार करे।।९।। तथैव तत्त्रिकोणे वा जन्मलग्नं विनिर्दिशेत्। मनुष्याणां पशूनां य द्वितीये दशमे रिपौ॥१०॥ प्राणपद की राशि से त्रिकोण (५।९।१) राशि में मनुष्यों के जन्मलग्न की राशि होती है। २, ६, १०वीं राशि पशुओं की हे।।१०।। तृतीये मदने लाभे विहङ्गानां विनिर्दिशेत्। कीटसर्पजलस्थानां शेषस्थानेषु संस्थितः।।११।। ३।७ वीं राशि में चिडियों का और शेष राशियों में कीट, सर्प, जल में रहनेवाले जीवों का जन्म होता है।।११।। उदाहरण—जैसे संवत् २०१३ श्रावण कृष्ण १३ शनिवार को इष्ट- ३२।५० पर लग्न ९।१७ में जन्म हुआ। इष्टकालिक सूर्य ३।१८ है। श्लोक ६१-६२ के अनुसार प्रथम प्रकार | श्लोक ६३ के अनुसार— से प्राणपद का साधन— | इष्टकाल ३२।२८।३० इष्टघटी X ४= ३२ X ४ = १२८ | इसका पल=१९४९।३० इसमें १५ का इष्टपल ÷ १५ = ५० ÷ १५ = ३ शेष ५ | भाग देने से १२९ लब्धि-राशि हुई और १२८ + ३ = १३१ | शेष १३/३० को दूना करने से २७ अंश १३१÷१२=१० लब्धि का त्याग कर देने से | हुआ। सूर्य को चर राशि में होने से सूर्य शेष ११ प्राणपद की राशि और पल शेष | में जोड देने से १२९।२७ को दूना करने से १० अंश यह मध्यम | ३।१८ प्राणपद हुआ। सूर्य चर राशि में है अतः | १३३।१५ सूर्य के राशि-अंश में जोड़ने से | १।१५° यह स्पष्ट प्राणपद हुआ, जिससे ११।१०°+३।१८।२२।२८ यह स्पष्ट | 'प्राणत्रिकोणे प्रवदन्ति लग्नम्' और प्राणपद हुआ। | 'लग्नांशप्राणांशपदेक्यता स्यात्' यह सिद्ध | होता है।