बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्राणपद की राशि मिथुन से जन्मलग्न की राशि तक गिनने से जन्मलग्न की राशि आठवीं आती है। अतः इष्टशोधन करना आवश्यक है, जिससे दोनों का परस्पर त्रिकोणत्व हो जाय। इसलिए इष्टकाल में १५ पल कम करने से ३२।३५ इष्टमान कर उपर्युक्त विधि से प्राणपद बनाने से १।२८ आया। यहाँ राशि तो ठीक आई, यानि वृषराशि, जिससे जन्मलग्न ९वीं राशि है किन्तु लग्नांश और प्राणांश एक नहीं हुए। अतः ६ पल और ३० विपल और घटा देने से शुद्ध इष्टकाल ३२।२८।३० हुआ। इस पर से प्राणपद बनाने से १/१५ आया, जो कि उक्त वाक्य के अनुसार शुद्ध है। विशेष—वस्तुतः प्राणपद शब्द का अर्थ है—प्राण देनेवाला पद (स्थान) या अंश। यह सूर्योदय से १५ पल में एक राशि का होता है। अतः ३ दंड में १२ राशि की पूर्ति हो जाती है और १ पल में २ अंश प्राणपद का होता है। इस नियम को ध्यान में रखकर इष्ट शुद्ध कर लेना चाहिए। उपर्युक्त शुद्ध किये हुए इष्टकाल द्वारा जन्माङ्ग का स्वरूप निम्नलिखित होगा। संवत् २०१३ शके १८७८ श्रावणकृष्ण १३ शनिवासरे पुनर्वसुभे प्रथम- चरणे इष्टम् ३२।२८।३० भयातम् १०।३२ भभोगः ५५।३३ लग्नम् ९।१५।२२।३७ शुभम्। स्पष्टग्रहाः जन्माङ्गम्
| सू. | चं. | मं. | बु. | गु. | शु. | श. | रा. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | १० | ४ | ४ | २ | ७ | ७ |
| १८ | २२ | २२ | ५ | १२ | ५ | १ | १३ |
| २६ | ३० | ३२ | २२ | ५० | ३ | ४८ | २७ |
| ३४ | ४७ | ८ | ५९ | ५४ | ५ | ५२ | २६ |
| जन्माङ्गम् (कुण्डली): | |||||||
| प्रथम भाव (लग्न): १० | |||||||
| द्वितीय भाव: ११ मं. | |||||||
| तृतीय भाव: १२ | |||||||
| चतुर्थ भाव: १ | |||||||
| पञ्चम भाव: के. | |||||||
| षष्ठ भाव: ३ शु. चं. | |||||||
| सप्तम भाव: ४ सू. | |||||||
| अष्टम भाव: बु. ५ बृ. | |||||||
| नवम भाव: ६ | |||||||
| दशम भाव: ७ | |||||||
| एकादश भाव: ८ रा. श. | |||||||
| द्वादश भाव: ९ | |||||||
| अथ निषेकलग्नानयनमाह— | |||||||
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मुनिपुङ्गव । | |||||||
| जन्मलग्नं च संशोध्य निषेकं परिशोधयेत् ॥१२॥ | |||||||
| हे मुनिश्रेष्ठ मैत्रेय ! अब मैं जन्मलग्न की शुद्धि के अनंतर निषेक | |||||||
| (गर्भाधान) लग्न की शुद्धि को कहता हूँ, इसे धारण करो ॥१२॥ |