बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलग्नाध्यायः ४१ तदहं सम्प्रवक्ष्यामि मैत्रेय त्वं विचारय। जन्मलग्नात् परिज्ञानं निषेकं सर्वजन्तुषु ॥१३॥ सभी जन्मलग्न के ज्ञान से सभी जन्तुओं के गर्भाधान लग्न का ज्ञान हो जाता है॥१३॥ यस्मिन् भावे स्थितो कोणस्तस्य मान्देर्यदन्तरम्। लग्नभाग्यन्तरं योज्यं यच्च राश्यादि जायते ॥१४॥ जिस भाव में शनि हो उस भाव और मान्दि (गुलिक) लग्न का अन्तर कर उसमें लग्न और भाग्य भाव के अन्तर को जोड़ देने से जो राश्यादि होती है॥१४॥ मासादिस्तन्मितं ज्ञेयं जन्मतः प्राक् निषेकजम्। यदादृश्यदलेऽङ्गेशस्तदेन्दोर्भुक्तभागयुक् ॥१५॥ जन्म से पूर्व के (निषेक काल के) मासादि का ज्ञान होता है। यदि लग्नेश अदृश्य चक्रार्ध (लग्न से सप्तम के बीच) में हो तो पूर्वोक्त मासादि में चन्द्रमा के भुक्त अंशादि को जोड़ने से मासादि होता है॥१५॥ तत्काले साधयेल्लग्नं शोधयेत्पूर्ववत्तनुम्। तस्माल्लग्नात्फलं वाच्यं गर्भस्थस्य विशेषतः ॥१६॥ इसे जानकर तात्कालिक लग्न को बनावे, वही गर्भाधान की लग्न होती है। उस लग्न से गर्भस्थ प्राणी के शुभ-अशुभ फल कहते हैं॥१६॥ शुभाशुभं वदेत् पित्रोर्जीवतं मरणं तथा। एवं निषेकलग्नेन सम्यक् ज्ञेयं स्वकल्पनात् ॥१७॥ माता-पिता के जीवन-मरण के शुभ-अशुभ फलों का विचार अपनी कल्पनावश करे॥१७॥ उदाहरण— जैसे पूर्वोक्त जन्माङ्ग में शनि कर्मभाव की सन्धि में है, अतः सन्धि ७ ।२१।५८।३३ और गुलिक लग्न ४।९।२६।३५ का अन्तर ३।२।३१।५८ हुआ। इसमें लग्न ९।१५।३१।५ और भाग्य भाव ५।२४।४१।२५ का अन्तर ४।२०।५१।२६ जोड़ देने से ७।२३।२३।२४ अर्थात् जन्म से पूर्व ७ माह २३ दिन २३ घटी २४ पल पूर्व गर्भाधान हुआ था। अथ भावलग्नानयनमाह— सूर्योदयात्समारभ्य घटीपञ्च प्रमाणतः। जन्मेष्टकालपर्यन्तं गणनीयं प्रयत्नतः॥१८॥ सूर्योदय से पाँच घटी के बराबर एक लग्न बीतती है। इसे भावलग्न