बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् या घटीलग्न कहते हैं।।१८।। ओजलग्ने यदा जन्म सूर्यराश्यनुसारतः। समलग्ने जन्मलग्नात्यत्संख्या प्राप्यते द्विज। भावलग्नं विजानीयात् होरालग्नं तदुच्यते ।।१९।। इसलिए इष्ट घटी पर्यन्त जितनी लग्न बीती हो उसमें यदि जन्मलग्न विषम राशि में हो तो सूर्य राशि से और यदि समराशि में हो तो जन्मलग्न से उक्त संख्या गिनने से जो लग्न हो वही भावलग्न होती है।।१९।। उदाहरण-इष्ट घटी ३२।२८।३० सूर्य ३।१८।२६ है। इष्ट घटी में ५ से भाग देने से ६।२९।४२ लब्धि हुई। इसे सूर्य में जोडने से १०।२८।८ यह भावलग्न हुई। विशेष-इष्टकाल और लग्न की प्रवृत्ति सूर्योदय से होने के कारण सूर्य में ही जोड़ना चाहिए। यह युक्तिसंगत मालूम होता है। अथ होरालग्नानयनमाह- सार्धद्विघटिका विप्र कालादिति विलग्नभात्। प्रयान्ति लग्नं तन्नाम होरालग्नं द्विजोत्तम।।२०।। जन्मलग्न से ढ़ाई घटी के तुल्य एक लग्न होती है, जिसे होरालग्न कहते हैं।।२०।। यज्जन्म विषमर्क्षेषु सूर्यादि गणयेत्क्रमात्। समलग्ने यदा जन्म गणयेज्जन्मभाद्विज ।।२१।। अतः इसके अनुसार इष्ट घटी पर्यन्त गिनने से जो संख्या हो उसमें यदि जन्म विषम लग्न में हो तो सूर्य की राशि से अन्यथा जन्मलग्न से गणना करने से जो राशि हो वही होरालग्न होती है।।२१।। उदाहरण-इष्ट घटी ३२।२८।३० है, इसमें ढाई ५/२ का भाग देने से लब्धि राश्यादि ०।२९।४२ हुई। इसमें सूर्य की राश्यादि जोड़ने से ४।१८।१८ यह राश्यादि होरालग्न हुआ। घटीलग्नानयनमाह- घटीलग्नं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं द्विजसत्तम। सूर्योदयात्समारभ्य जन्मकालावधि क्रमात् ।।२२।। हे द्विजश्रेष्ठ ! मैं घटीलग्न को कह रहा हूँ, उसे सुनो। सूर्योदय से आरम्भ कर जन्म समय पर्यन्त क्रम से।।२२।। एकैकं घटिकामानाल्लग्नं राश्यादिकं च यत्। तदेव घटिकालग्नं कथितं ऋषिभिः पुरा ।।२३।।