बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलग्नाध्यायः ४३ एक-एक घटी के तुल्य एक राशि के हिसाब से जो राशि हो वही घटीलग्न होती है, ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है।।२३।। राशीन् तत्र घटीतुल्या द्विभागाः पलसम्मिताः। योज्यं सदा स्पष्टभानौ घटीलग्नं स्फुटं भवेत् ।।२४।। क्रमाल्लग्नादि भावांश्च संलिखेत् द्विजसत्तम । सूर्यादि यत्र ऋक्षे च जन्मवत्संलिखेद्विज ।।२५।। इसमें इष्ट-घटी के तुल्य राशि होती है और एक पल में दो अंश होते हैं। इसके अनुसार जो राशि और अंश हो उसमें सदा सूर्य के राशि- अंश को जोड़ देने से स्पष्ट घटी-लग्न होती है। इसे लग्न मानकर द्वादशभाव चक्र लिखकर जन्मकालिक सूर्य आदि ग्रह जिन-जिन राशियों में हों, उन्हें उन्हीं-उन्हीं राशियों में देवें।।२४-२५।। उदाहरण—इष्टकाल ३२।२८।३० हैं और सूर्य ३।१८।२६ है, उक्त प्रकार से ३२ राशि १४ अंश हुआ। इसमें सूर्य के राश्यादि को जोड़ने से ० राशि २ अंश यह घटीलग्न हुई। अथ वर्णदलग्नानयनमाह— जन्महोराख्यलग्नर्क्षसंख्या ग्राह्या पृथक् पृथक्। ओजे लग्ने त्वेकयुग्मे चक्रशुद्धैकसंयुता ।।२६।। जन्मलग्न की राशि और होरालग्न की राशि संख्या विषम हों तो अथवा दोंनो सम हों तो, दोनों का योग करने से यदि विषम राशि हो तो वही वर्णद राशि होती है। दोनों में एक विषम और दूसरी सम हो तो सम को १२ राशि में घटाकर शेष को पहले में घटाने से शेष वर्णद राशि होती है।।२६।। युग्मौजसाम्ये संयोज्य वियोज्यान्योनमन्यथा। मेषादितः क्रमादोजे मीनादेरुत्क्रमात्समे ।।२७।। विषम राशि में मेषादि क्रम से और सम राशि में मीनादि से उत्क्रम गणना से है।।२७।। एवं यल्लग्नमायाति वर्णदं तत् प्रकीर्त्तितम्। एवं द्वादशभावानां वर्णदं लग्नमानयेत् ।।२८।। जो लग्न हो वही वर्णद लग्न होती है। इस प्रकार सभी भावों की वर्णद लग्न बनानी चाहिए।।२८।।