भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् विशेष-१. जन्मलग्न और होरालग्न दोनों विषम हों तो दोनों का योग यदि विषम राशि हो तो वही वर्णद राशि होती है। २. यदि दोनों सम हों तो दोनों को १२ राशि में घटाकर शेषों का योग करने से यदि विषम राशि हो तो वही वर्णद राशि होती है। ३. यदि जन्मलग्न होरालग्न दोनों में एक विषम और दूसरी सम हो तो सम राशि को १२ राशि में घटाकर दोनों का अन्तर करने से शेष विषम राशि हो तो वर्णद राशि होती है। उपर्युक्त तीनों प्रकारों से यह स्पष्ट है कि योग वा अन्तर करने से सम राशि आवे तो उसे १२ राशि में पुनः घटा देने से वर्णद राशि होती है अर्थात् वर्णद राशि हमेशा विषम ही होती है। उदाहरण-जन्मलग्न ९।१५।२२।३७ और होरालग्न ४।१८।१८ है। यहाँ जन्मलग्न सम और होरालग्न विषम है, अतः नियम तीन के अनुसार जन्मलग्न को १२ राशि में घटाने से शेष २।१४।३७।२३ हुआ। यही लग्न की वर्णद राशि है। यदि द्वावोजराशौ वा समराशौ यदा द्विज। द्वयं संयोजनीयं वै संज्ञे या वर्णदा भवेत् ।।२९।। यदि दोनों विषम वा समराशि हों तो दोनों का योग करने से वर्णद राशि होती है।।२९।। एकस्थाने ओजराशावपरे समभे द्विज। समं तु चक्रतः शोध्यं न्यूनसंख्यां विशोधयेत् ।।३०।। एक विषम राशि हो और दूसरी सम राशि हो तो सम राशि को १२ राशि में घटाने से जो न्यून हो उसे पुनः घटाने से वर्णद होती है।।३०।। मेषादिकेन गणयेत्क्रममार्गेण वै द्विज। यल्लब्धमन्तिमो राशिः स राशिर्वर्णदो भवेत् ।।३१।। मेष से क्रममार्ग से गणना करने से अंतिम राशि पर्यन्त जो राशि आवे वही वर्णद होती है।।३१।। युग्मलग्नेषु यज्जन्म मीनादेरपसव्यतः। क्रमेण लग्नहोरान्तं गणयेत् द्विजसत्तम ।।३२।। समलग्न में जन्म होने से मीनादि अपसव्य मार्ग से गिनने से लग्न पर्यन्त गणना करनी चाहिए।।३२।।