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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् विशेष-१. जन्मलग्न और होरालग्न दोनों विषम हों तो दोनों का योग यदि विषम राशि हो तो वही वर्णद राशि होती है। २. यदि दोनों सम हों तो दोनों को १२ राशि में घटाकर शेषों का योग करने से यदि विषम राशि हो तो वही वर्णद राशि होती है। ३. यदि जन्मलग्न होरालग्न दोनों में एक विषम और दूसरी सम हो तो सम राशि को १२ राशि में घटाकर दोनों का अन्तर करने से शेष विषम राशि हो तो वर्णद राशि होती है। उपर्युक्त तीनों प्रकारों से यह स्पष्ट है कि योग वा अन्तर करने से सम राशि आवे तो उसे १२ राशि में पुनः घटा देने से वर्णद राशि होती है अर्थात् वर्णद राशि हमेशा विषम ही होती है। उदाहरण-जन्मलग्न ९।१५।२२।३७ और होरालग्न ४।१८।१८ है। यहाँ जन्मलग्न सम और होरालग्न विषम है, अतः नियम तीन के अनुसार जन्मलग्न को १२ राशि में घटाने से शेष २।१४।३७।२३ हुआ। यही लग्न की वर्णद राशि है। यदि द्वावोजराशौ वा समराशौ यदा द्विज। द्वयं संयोजनीयं वै संज्ञे या वर्णदा भवेत् ।।२९।। यदि दोनों विषम वा समराशि हों तो दोनों का योग करने से वर्णद राशि होती है।।२९।। एकस्थाने ओजराशावपरे समभे द्विज। समं तु चक्रतः शोध्यं न्यूनसंख्यां विशोधयेत् ।।३०।। एक विषम राशि हो और दूसरी सम राशि हो तो सम राशि को १२ राशि में घटाने से जो न्यून हो उसे पुनः घटाने से वर्णद होती है।।३०।। मेषादिकेन गणयेत्क्रममार्गेण वै द्विज। यल्लब्धमन्तिमो राशिः स राशिर्वर्णदो भवेत् ।।३१।। मेष से क्रममार्ग से गणना करने से अंतिम राशि पर्यन्त जो राशि आवे वही वर्णद होती है।।३१।। युग्मलग्नेषु यज्जन्म मीनादेरपसव्यतः। क्रमेण लग्नहोरान्तं गणयेत् द्विजसत्तम ।।३२।। समलग्न में जन्म होने से मीनादि अपसव्य मार्ग से गिनने से लग्न पर्यन्त गणना करनी चाहिए।।३२।।

लग्नाध्यायः ४५ ओजराशौ द्वयं लब्धं तथा द्वौ समराशिगौ । साजात्ये योजनं कार्यं जायते वर्णदा दशा ।। ३३ ।। यदि दोनों विषम राशि में अथवा दोनों समराशि में हों तो दोनों के सजातीय होने से दोनों का योग करने से वर्णद दशा होती है ।। ३३ ।। वैजात्ये पूर्ववत्कार्याधिक्ये न्यूनं विशोधयेत् । मेषादि सव्यमार्गेण गणनीयं प्रयत्नतः ।। ३४ ।। दोनों विजातीय हों तो पूर्ववत् विषम में न्यून को घटाकर मेषादि से सव्यमार्ग से गणना करना चाहिए ।। ३४ ।। यल्लब्धमन्तिमो राशिस्तद्राशिर्वर्णदो भवेत् । वर्षसंख्या विजानीयात् चरपर्याप्रमाणतः ।। ३५ ।। जो लग्न से अंतिम राशि हो वही वर्णद राशि होती है। वही वर्णद संख्या चराति क्रम से होती है ।। ३५ ।। होरालग्नभयोर्नेया दुर्बला वर्णदा दशा । यत्संख्या वर्णदा लग्नात्तत्र संख्या क्रमेण तु ।। ३६ ।। होरालग्न से आई हुई वर्णद दशा दुर्बल होती है, वहाँ पर जन्मलग्न से लाई हुई दशा की संख्या लेनी चाहिए ।। ३६ ।। क्रमव्युत्क्रमभेदेन दशा स्यात् पुरुषस्त्रियोः । वर्णदा राशिमेषादि मीनादि गणयेत्क्रमात् ।। ३७ ।। क्रम-उत्क्रम भेद से पुरुष और स्त्री की दशा होती है। और वर्णद राशि मेषादि और मीनादि से गिनना चाहिए ।। ३७ ।। फलविचारमाह– वर्णदात्स्यात् त्रिकोणे च पापयुक् पापराशिकः । पापयोगकृते विप्र दशापर्यन्तजीवनम् ।। ३८ ।। हे विप्र ! वर्णद राशि से त्रिकोण में पापग्रह की युति हो अथवा पापग्रह की राशि हो, उसमें पापग्रह की युति हो तो उसके दशा पर्यन्त आयु होती है ।। ३८ ।। रुद्रशूले यथैवायुर्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम । तथैव वर्णदादप्यायुश्चिन्त्यं द्विजोत्तम ।। ३९ ।। जिस प्रकार रुद्रशूल पर्यन्त आयु होती है उसी प्रकार वर्णद से भी आयु का विचार करना चाहिए ।। ३९ ।।

४६ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् वर्णदात्सप्तमाद्राशेः कलत्रायुः विचिन्तयेत्। पञ्चमे तनयस्यायुर्मातुः स्यात्तूर्यभावके ॥४०॥ वर्णद से पाँचवीं राशि से पुत्र की, चौथी राशि से माता की ॥४०॥ तृतीये भ्रातुरायुः स्याज्ज्येष्ठभ्रातुर्भवेद्द्विज। 'पितुस्तु नवमाद् भावादायुर्ज्ञेयं विचक्षणैः॥४१॥ तीसरी राशि से भाई की और ग्यारहवीं राशि से ज्येष्ठ भाई की, नवीं राशि से पिता की आयु का विचार करना चाहिए ॥४१॥ शूलराशिदशायां वै प्रबलायामरिष्टकम्। वर्णदाल्लग्नवच्चिन्त्यं फलं सर्वं विचक्षणैः ॥४२॥ शूलराशि की दशा में उन लोगों को प्रबल अरिष्ट होता है। वर्णद लग्न से लग्नभाव के समान ही सभी बातों का विचार करना चाहिए॥४२॥ एवं तन्वादिभावानां कारयेद्वर्णदा दशा। पूर्ववच्च फलं ज्ञेयं शुभाशुभं द्विजोत्तम ॥४३॥ इसी प्रकार लग्न आदि सभी भावों की वर्णद राशि बनाना चाहिए। उस पर से प्रत्येक भावों के शुभ-अशुभ फलों का विचार पूर्ववत् करना चाहिए ॥४३॥ ग्रहाणां वर्णदा नैव राशीनां वर्णदा दशा। यल्लब्धं पूर्वमब्दानां भानुभागं च कारयेत् ॥४४॥ ग्रहों की वर्णद राशि नहीं होती है। इस प्रकार वर्णद राशि के दशा का जो वर्ष मिले, उसमें १२ का भाग देकर ॥४४॥ क्रमव्युत्क्रमभेदेन संलिखेद्दै दशान्तरम्। चरस्थिरदशायां वै वर्णदायास्तथैव च॥४५॥ जैसे चर आदि दशा में क्रम-उत्क्रम से अन्तर्दशा लिखी जाती है उसी प्रकार यहाँ भी अन्तर्दशा लिखें॥४५॥ पूर्णायां कारकस्यैव केन्द्रस्थानां दशा भवेत्। ततः पणफरस्थानामापोक्लिम दशां ततः॥४६॥ पहले केन्द्रस्थ की दशा, इसके बाद पणफरस्थ की और इसके बाद आपोक्लिमस्थ की दशा होती है॥४६॥ पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां लग्नाध्याय चतुर्थः।

षोडशवर्गाध्यायः ४७ अथ षोडशवर्गप्रकरणम् वर्गान् षोडश संख्याकान् ब्रह्मा प्रोक्तं पितामहः। तानहं सम्प्रवक्ष्यामि मैत्रेय श्रूयतामिति ।।१।। हे मैत्रेय ! लोकपितामह ब्रह्माजी ने जो सोलह वर्गों को कहा है, उसे मैं कहता हूँ।।१।। क्षेत्रं होरां च द्रेष्काणश्चतुर्थांशः सप्तमांशकः। नवांशो दशमांशश्च सूर्यांशः षोडशांशकः।।२।। १ गृह, २ होरा, ३ द्रेष्काण, ४ चतुर्थांश, ५ सप्तमांश, ६ नवांश, ७ दशमांश, ८ द्वादशांश, ९ षोडशांश ।।२।। त्रिंशांशो वेदवाह्वंशो भांशास्त्रिंशांशकस्तथा। खवेदांशोऽक्षवेदांशः षष्ठ्यंशश्च ततः परम्।।३।। १० त्रिंशांश, ११ चतुर्विंशांश, १२ सप्तविंशांश, १३ त्रिंशदंशांश, १४ चत्वारिंशांश, १५ पञ्चचत्वारिंशांश, १६ षष्ठ्यंश ये १६ वर्ग हैं।।३।। गृहहोराकथनम्– तत्क्षेत्रं यस्य खेटस्य राशेर्यो यस्य नायकः। सूर्येन्दोर्विषमे राशौ समे तद्विपरीतकम्।।४।। जो ग्रह जिस राशि का स्वामी है वही उसका गृह है। विषम राशि में पहली होरा सूर्य की और दूसरी चन्द्रमा की होती है। सम राशि में पहली होरा चन्द्रमा की और दूसरी सूर्य की होती है।।४।। पितरश्चन्द्रहोरेशा देव्यः सूर्यस्य कीर्त्तिताः। राशेरर्द्धं भवेद्धोरा ताश्चतुर्विंशतिः स्मृताः। मेषादि तासां होराणां परिवृत्तिद्वयं भवेत् ।।५।। चन्द्रमा के होरा के स्वामी पितर और सूर्य के होरा के स्वामी देवियाँ होती हैं। एक राशि का आधा १५ अंश का एक होरा होता है अर्थात् १२ राशियों में २४ होरा होती है, इसलिये मेषादि राशियों की दो आवृत्ति होती है।।५।। उदाहरण—जैसे लग्न ९।१५।२२।५७ है, लग्न सम राशि है और १५ अंश से अधिक है, अतः दूसरी होरा सूर्य की है।

४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् स्पष्टार्थ चक्र-

हो.मे.वृ.मिं.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.राशयः
सू.चं.सू.चं.सू.चं.सू.चं.सू.चं.सू.चं.स्वामिनः
चं.सू.चं.सू.चं.सू.च.सू.चं.सू.चं.सू.स्वामिनः
द्रेष्काणमाह-
राशित्रिभागा द्रेष्काणास्ते च षट्त्रिंशदीरिताः।
परिवृत्तित्रयं तेषां मेषादेः क्रमशो भवेत्॥६॥
एक राशि के तीसरे भाग का अर्थात् १० अंश का एक द्रेष्काण होता
है, अर्थात् एक राशि में ३ द्रेष्काण होते हैं। १२ राशि में कुल ३६ द्रेष्काण
होते हैं॥६॥
स्वपञ्चनवपानां च विषमेषु समेषु च।
नारदागस्तिदुर्वासा द्रेष्काणेशाश्चरादिषु ॥७॥
विषम एवं सम राशि में पहले द्रेष्काण का स्वामी उसी राशि का स्वामी,
दूसरे का उस राशि से पाँचवी राशि का स्वामी और तीसरे का उस
राशि से नवीं राशि का स्वामी होता है। और पहले द्रेष्काण के स्वामी नारद,
दूसरे के अगस्त और तीसरे के दुर्वासा स्वामी होते हैं॥७॥
उदाहरण-जैसे जन्मलग्न ९।१५।२२।३७ है, इसमें दूसरा द्रेष्काण है
जिसके स्वामी शुक्र हैं और अधिपति अगस्त हैं।
द्रेष्काण चक्र-
स्वामीमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.राशयः
:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---
नारद१०१११२स्वामिनः
अगस्त१०१११२स्वामिनः
दुर्वासा१०१११२स्वामिनः
अथ चतुर्थांशमाह-
स्वर्क्षादि केन्द्रपतयस्तुर्यांशेशाः क्रियादयः।
सनकश्च सनन्दश्च कुमारश्च सनातनः॥८॥

षोडशवर्गाध्यायः ४९ एक राशि में ७ अंश ३० कला के चार चतुर्थांश होते हैं। प्रत्येक राशि में उस राशि से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम राशियों के स्वामी क्रम से चतुर्थांश के स्वामी होते हैं और सर्वदा क्रम से सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन ये स्वामी होते हैं॥८॥ उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। इसमें ३रा चतुर्थांश कर्क राशि के स्वामी चन्द्रमा का और अधिपति सनत्कुमार का है। चतुर्थांश चक्र—

| स्वामिनः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | अंशाः | | :--- | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | | सनकः | १<br>मं. | २<br>शु. | ३<br>बु. | ४<br>चं. | ५<br>सू. | ६<br>बु. | ७<br>शु. | ८<br>मं. | ९<br>बृ. | १०<br>श. | ११<br>श. | १२<br>बृ. | ७<br>३० | | सनन्दनः | ४<br>चं. | ५<br>सू. | ६<br>बु. | ७<br>शु. | ८<br>मं. | ९<br>बृ. | १०<br>श. | ११<br>श. | १२<br>बृ. | १<br>मं. | २<br>शु. | ३<br>बु. | १५ | | सनत्कुमारः | ७<br>शु. | ८<br>मं. | ९<br>बृ. | १०<br>श. | ११<br>श. | १२<br>बृ. | १<br>म. | २<br>शु. | ३<br>बु. | ४<br>चं. | ५<br>सू. | ६<br>बु. | २२/३० | | सनातनः | १०<br>श. | ११<br>श. | १२<br>बृ. | १<br>मं. | २<br>शु. | ३<br>बु. | ४<br>चं. | ५<br>सू. | ६<br>बु. | ७<br>शु. | ८<br>मं. | ९<br>बृ. | ३० |

अथ सप्तमांशमाह— सप्तमांशास्त्वोजगृहे गणनीया निजेशतः। युग्मराशौ तु विज्ञेया सप्तमर्क्षादिनायकम् ॥९॥ एक राशि में ४ अंश १७ कला के सात सप्तमांश होते हैं। विषम राशि में उसी राशि से और सम राशि में उससे सातवीं राशि से ७ सप्तमांश के स्वामी होते हैं॥९॥ क्षारक्षीरौ च दध्याज्यौ तथैक्षुरससम्भवः। मद्यशुद्धजलावोजे समे शुद्धजलादिकाः॥१०॥ उसके क्षार, क्षीर, आज्य, इक्षुरस, मद्य और शुद्ध जल विषम राशि में और सम राशि में शुद्ध जल, मद्य, इक्षुरस, आज्य, दधि, क्षीर, क्षार, ये विशेष अधिकारी होते हैं॥१०॥ उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। इसमें तीसरा सप्तमांश है, जिसके स्वामी बुध और विशेष अधिपति इक्षुरस है।

५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सप्तमांश चक्र-

पतयः१०१११२
क्षार१ मं.८ मं.३ बु१० श.५ सू.१२ बृ.७ शु.२ शु.९ बृ.४ चं.११ श.६ बु.
क्षीर२ शु.९ बृ.४ चं.११ श.६ बु.१ मं.८ मं.३ बु.१० श.५ सू.१२ बृ.७ शु.
दधि३ बु.१० श.५ सू.१२ बृ.७ शु.२ शु.९ बृ.४ चं.११ श.६ बु.१ मं.८ मं.
आज्य४ चं.११ शु.६ बु.१ मं.८ मं.३ बु.१० श.३ बु.१२ बृ.७ शु.२ शु.९ बृ.
इक्षु-रस५ सू.१२ बृ.७ शु.२ शु.९ बृ.४ चं.११ श.६ बु.१ मं.८ मं.३ बु.१० श.
मद्य६ बु.१ मं.८ मं.३ बु.१० श.५ सू.१२ बृ.७ शु.२ शु.९ बृ.४ चं.११ श.
शुद्ध जल७ शु.२ शु.९ बृ.४ चं.११ श.६ बु.१ मं.८ मं.३ मं.१० श.५ सू.७ शु.
नवमांशाधिपतिमाह-
नवांशाश्चरे तस्मात्स्थिरे तन्नवमादितः।
उभये तत्पञ्चमादेरिति चिन्त्यं विचक्षणैः।
देवानृराक्षसाश्चैव चरादिषु गृहेषु च॥१९१॥
एक राशि में ३ अंश २० कला के नव नवमांश होते हैं। चर राशि में
उसी राशि से, स्थिर राशि में उससे नवम राशि से और द्विस्वभाव राशि में
उससे पाँचवीं राशि से नव राशि तक प्रत्येक राशि ३ अंश २० कला
के तुल्य होती हैं। क्रम से देवता, नर और राक्षस अंशेश होते हैं॥१९१॥
उदाहरण- लग्न ९।१५।२२।३७ में ३ अंश २० कला के हिसाब से
पाँचवाँ नवमांश वृष राशि का हुआ। इसके स्वामी शुक्र और नर अंशेश
हुए।

षोडशवर्गाध्यायः ५१ नवमांशचक्रम्-

अंशाःस्वामीसं.मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.
३/२०देवतामे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.क.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.क.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.क.<br>चं.
६/४०नरवृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.सिं.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.मे.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.सिं.<br>सू.
१०राक्षसमि.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.क.<br>बु.मि.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.क.<br>बु.मि.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.क.<br>बु.
१३/२०देवताक.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.क.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.क.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.
१६/४०नरसिं.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.सिं.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.सिं.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.
२०राक्षसकं.<br>बु.मि.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.क.<br>बु.मं.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.क.<br>बु.मि.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.
२३/२०देवतातु.<br>शु.क.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.क.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.तु.<br>शु.क.<br>चं.मे.<br>मं.म.<br>श.
२६/४०नरवृ.<br>मं.सिं.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.सिं.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.वृ.<br>मं.सिं.<br>सू.वृ.<br>शु.कुं.<br>श.
३०राक्षसध.<br>बृ.क.<br>बु.मि.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.क.<br>बु.मि.<br>बु.मी.<br>बृ.ध.<br>बृ.क.<br>बु.मि.<br>बु.मी.<br>बृ.

अथ दशमांशमाह- दिगंशयाः ततश्चोजे युग्मे तन्नवमाद्वदेत्। पूर्वादि दश दिक्पाला इन्द्राग्नियमराक्षसाः ।।१२।। वरुणो मारुतश्चैव कुबेरेशानपद्मजाः। अनन्तश्चोक्तमोजे तु समे स्याद्व्युत्क्रमेण च ।।१३।। एक राशि में दश दशमांश प्रत्येक ३ अंश के होते हैं। यदि विषम राशि लग्न हो तो उसी राशि से और सम राशि हो तो उससे नवीं राशि से दश दशमांश होते हैं। विषम राशि में क्रम से इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, मारुत, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा और अनन्त इन पूर्वादि दिशाओं के दिक्पालों का होता है और सम राशि में उत्क्रम से अधिपति होते हैं ।।१२-१३।।

५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। इसमें ३ अंश के अनुसार छठा ६ दशमांश हुआ। लग्न राशि के सम होने से उससे ९वीं राशि कन्या से गिनने से छठी राशि कुम्भ के स्वामी शनि का दशमांश हुआ। इसके मारुत स्वामी हैं। दशमांशचक्रम्—

विषमे स्वामिनःअंशमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.समे स्वामिनः
इन्द्रः१ मं.१० श.३ बु.१२ बृ.५ सू.२ शु.७ शु.४ चं.९ बृ.६ बु.११ श.८ मं.अनंत
अग्निः२ शु.११ श.४ चं.१ मं.६ शु.३ बु.८ मं.५ सू.१० श.७ शु.१२ बृ.६ बु.ब्रह्मा
यमः३ बु.१२ बृ.५ सू.२ शु.७ शु.४ चं.९ बृ.६ बु.११ श.८ मं.१ मं.१० श.ईशान
राक्षस१२४ चं.१ मं.६ बु.३ बु.८ मं.५ सू.१० श.७ शु.१२ बृ.९ बृ.२ शु.११ श.कुबेर
वरुण१५५ सू.२ शु.७ शु.४ चं.९ बृ.६ बु.११ श.८ मं.१ मं.१० श.३ बु.१२ बृ.मारुत
मारुत१८६ बु.३ बु.८ मं.५ सू.१० श.७ शु.१२ बृ.९ बृ.२ शु.११ श.४ चं.१ मं.वरुण
कुबेर२१७ शु.४ चं.९ बृ.६ बु.११ श.८ मं.१ मं.१० श.३ बु.१२ बृ.५ सू.२ शु.राक्षस
ईशान२४८ मं.५ सू.१० श.७ शु.१२ बृ.९ बृ.२ शु.११ श.४ चं.१ मं.६ बु.३ बु.यम
ब्रह्मा२७९ बृ.६ बु.११ श.८ मं.१ मं.१० श.३ बु.१२ बृ.५ सू.२ शु.७ शु.४ चं.अग्नि
अनंत३०१० शु.७ बृ.१२ बृ.९ शु.२ श.११ चं.४ मं.१ बु.६ बु.३ बु.८ मं.५ सू.इन्द्र
अथ द्वादशांशमाह—
द्वादशांशस्य गणना तत्तत्क्षेत्राद्विनिर्दिशेत्।
तेषामधीशाः क्रमशोगणेशाश्वियमहयः॥१४॥
एक राशि में १२ द्वादशांश २ अंश ३० कला के होते हैं। उनकी गणना
उसी राशि से होती है। उनके स्वामी क्रम से गणेश, अश्विनीकुमार,
यम और अहि (सर्प) होते हैं॥१४॥
उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। यहाँ २°।३०' के अनुसार ७वाँ
द्वादशांश मकर से गिनने से कर्क राशि के स्वामी चन्द्रमा का है। उसके
स्वामी यम हैं।

षोडशवर्गाध्यायः ५३ अथ द्वादशांशचक्रम्-

स्वामीमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अंशाः
गणेश१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.२।३०
अश्वि२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.५।०
यम३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.७।३०
अहि४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.१०।०
गणेश५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.१२।३०
अश्वि६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.१५।०
यम७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.१७।३०
अहि८ मं.९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.२०।०
गणेश९ बृ.१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.२२।३०
अश्वि१० श.११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.२५।७
यम११ श.१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.२७।३०
अहि१२ बृ.१ मं.२ शु.३ बु.४ चं.५ सू.६ बु.७ शु.८ मं.९ बृ.१० श.११ श.३०।०

अथ षोडशांशमाह- अजसिंहाश्वितो ज्ञेया नृपांशाः क्रमशः सदा। अजविष्णुहरः सूर्यो ह्योजे युग्मे प्रतीपकम् ॥१५५॥ एक राशि में १अंश ५२ कला और ३० विकला का एक षोडशांश होता है। इस प्रकार एक राशि में १६ षोडशांश होता है। मेष आदि राशियों में क्रम से मेष, सिंह और धन से आरम्भ होता है। इनके अज, विष्णु, हर और सूर्य स्वामी होते हैं॥१५५॥ उदाहरण- लग्न ९।१५।२२।३७ है। इसमे उक्त नियम से नवाँ षोडशांश धन राशि के स्वामी गुरु का हुआ। इसके स्वामी ब्रह्मा हैं।

५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् षोडशांशचक्रम्-

सू.विषमे स्वा.मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.समे स्वा.अं.क.वि.
ब्र.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.सू.५२३०
वि.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.ह.४५
ह.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.वि.३७३०
सू.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.ब्र.३०
ब्र.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.सू.२२३०
वि.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.ह.१११५
ह.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.वि.१३३०
सू.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.ब्र.१५
ब्र.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.सू.१६५२३०
१०वि.१०<br>शं.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.ह.१८४५
११ह.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.वि.२०३७३०
१२सू.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.ब्र.२२३०
१३ब्र.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.<br>मं.<br>सू.<br>बृ.सू.२४२२३०
१४वि.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.<br>शु.<br>बु.१०<br>श.ह.२६१५
१५ह.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.<br>बु.<br>शु.११<br>श.वि.२८३०
१६सू.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.<br>चं.<br>मं.१२<br>बृ.ब्र.३०

अथ विंशांशमाह- अथ विंशतिभागानामधिपा ब्रह्मणोदिताः। क्रियाच्चरे स्थिरे चापान्मृगेन्द्राद्द्विस्वभावके ॥ १६॥

षोडशवर्गाध्यायः ५५ एक राशि में २० विंशांश १अंश ३० कला के होते हैं। चर राशि में मेष से, स्थिर राशि में धन से और द्विस्वभाव राशि में सिंह से आरम्भ होकर २० राशि तक होता है।।१६।। काली गौरी जया लक्ष्मीर्विजया विमला सती । तारा ज्वालामुखी श्वेता ललिता बगलामुखी ।।१७।। इनके स्वामी विषम राशि में क्रम से काली, गौरी, जया, लक्ष्मी, विजया, विमला, सती, तारा, ज्वालामुखी, श्वेता, ललिता, बगलामुखी है।।१७।। प्रत्यङ्गिरा शची रौद्री भवानी वरदा जया । त्रिपुरा सुमुखी चेति विषमे परिचिन्तयेत् ।।१८।। प्रत्यंगिरा, शची, रौद्री, भवानी, वरदा, जया, त्रिपुरा, सुमुखी है।।१८।। समराशौ दया मेधा छिन्नशीर्षा पिशाचिनी । धूमावती च मातङ्गी बाला भद्राऽरुणाऽनला ।।१९।। सम राशि में दया, मेधा, छिन्नशीर्षा, पिशाचिनी, धूमावती, बाला, भद्रा, अरुणा और अनला है।।१९।। पिङ्गला छुच्छुका घोरा वाराही वैष्णवी सिता । भुवनेशी भैरवी च मङ्गला ह्यपराजिता ।।२०।। पिंगला, छुच्छुका, घोरा, वाराही, वैष्णवी, सिता, भुवनेशी, भैरवी, मंगला और अपराजिता ये स्वामी होते हैं।।२०।। उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है, अतः ११वाँ त्रिंशांश कुम्भ राशि के अधिपति शनि का हुआ और इसके स्वामी पिंगला देवी हुई। विंशांशचक्रम्—

सां.विषमे स्वा.मे.वृ.मि.क.सि.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.समे स्वा.अ.क.
काली<br>मं.<br>बृ.<br>सु.<br>मं.<br>बृ.<br>सु.<br>मं.<br>बृ.<br>सु.<br>मं.<br>बृ.<br>सु.दया३०
गौरी<br>शु.१०<br>श.<br>बु.<br>शु.१०<br>श.<br>बु.<br>शु.१०<br>श.<br>बु.<br>शु.१०<br>श.<br>बु.मेधा
जया<br>बु.११<br>श.<br>शु.<br>बु.११<br>श.<br>शु.<br>बु.११<br>श.<br>शु.<br>बु.११<br>श.<br>शु.छिन्नशी.३०

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५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

सांविषमे स्वा.मे.वृ.मि.क.सि.कं.तु.वृ.ध.मं.कुं.मी.समे स्वा.अं.क.
लक्ष्मी४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.पिशाचि.६ । ०
विजया५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.धूमावती७ । ३०
विमला६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.मातंगी९ । ०
सती७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.काला१० । ३
तारा८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.भद्रा१२ । ०
ज्वालामु.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.अरुणा१३ । ३
१०श्वेता१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.अनला१५ । ०
११ललिता११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.पिंगला१६ । ३
१२बगला१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.छुच्छुका१८ । ०
१३प्रत्यंगिरा१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.घोरा१९ । ३
१४शची२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.वाराही२१ । ०
१५रौद्री३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.वैष्णवी२२ । ३
१६भवानी४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.सिता२४ । ०
१७वरादा५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.५ सु.१ मं.९ बृ.भुवनेश्व.२५ । ३
१८जया६ बु.२ शु.१० श.६ बुं.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.६ बु.२ शु.१० श.भैरवी२७ । ०
१९त्रिपुरा७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.७ शु.३ बु.११ श.मंगला२८ । ३
२०सुमुखी८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.८ मं.४ चं.१२ बृ.अपराजि.३० । ०

सिद्धांशकमाह- सिद्धांशकानामधिपाः सिंहादोजभके गृहे।

षोडशवर्गाध्यायः ५७ कर्काद्युग्मभके खेटे स्कन्दः पशुधरोऽनलः ।।२१।। विश्वकर्मा भगो मित्रो भगोऽन्तकवृषध्वजाः । गोविन्दो मदनो भीमः सिंहादौ विषमे क्रमात् । कर्कादौ समभे भीमाद्विलोमेन विचिन्तयेत् ।।२२।। एक राशि में १ अंश १५ कला के २४ चतुर्विंशांश होते हैं। विषम राशि लग्न हो तो सिंह से और सम राशि में कर्क से गणना कर २४ राशियों का चतुर्विंशांश होता है। विषम राशि में क्रम से स्कंद, पशुधर, अनल, विश्वकर्मा, भग, मित्र, भग, अंतक, वृषध्वज, गोविंद, मदन, भीम, फिर स्कंद से भीम पर्यन्त एवं सम राशि में भीम से उत्कय रीति से गिनने से स्वामी होते हैं।। २१-२२ ।। उदाहरण- लग्न ९ ।१५ ।२२ ।३७ सम राशि में कर्क से गिनने से १३वाँ कर्क राशि यानि चन्द्र का चतुर्विंशांश हुआ और उसके भीम स्वामी हुए। चतुर्विंशांश चक्रम्—

सं.विषमे स्वा.में.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.समे स्वा.अं.क.
स्कन्दः१।१५भीमः
पशुधरः२।३०मदनः
अनलः३।४५गोविन्दः
विश्वकः५।०वृषध्वजः
भगः६।१५अंतकः
मित्रः१०१०१०१०१०१०७।३०यमः
यमः१११०१११०१११०१११०१११०१११०८।४५मित्रः
अंतकः१२१११२१११२१११२१११२१११२१११०।०भगः
वृषध्वजः१२१२१२१२१२१२११।१५विश्वक.
१०गोविन्दः१२।३०अनलः
११मदनः१३।४५पशुधरः
१२भीमः१५।०स्कंदः
१३सकन्दः१६।१५भीमः
१४पशुधरः१७।३०मदनः
१५अनलः१८।४५गोविन्दः
१६विश्वक.२०।०वृषध्वजः
१७भगः२१।१५अंतकः

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५८ : बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

सं.विषमे स्वा.मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.समे स्वा.अं.क.
१८मित्रः१०१०१०१०१०१०२२३०यमः
१९यमः१११०१११०१११०१११०१११०१११०२३४५मित्रः
२०अंतकः१२१११२१११२१११२१११२१११२११२५यमः
२१वृषध्वजः१२१२१२१२१२१२२६१५विश्वकर्मा
२२गोविन्दः२७३०अनलः
२३मदनः२८४५पशुधरः
२४भीमः३०स्कन्दः
भांशमाह-
नक्षत्रेशाः क्रमाद्द्वस्रयमवह्निपितामहाः।
चन्द्रेशादितिजीवाहि पितरो भगसंज्ञिताः।।२३।।
अर्यमार्कस्त्वष्ट्रमरुच्छक्राग्निमित्रवासवाः।
निर्र्त्युदकविश्वेऽज गोविन्दो वसवोऽम्बुपः।।२४।।
ततोऽजयादहिर्बुध्न्यः पूषा चैव प्रकीर्त्तिताः।
नक्षत्रेशास्तु भांशेशा भांशसंख्यः चरात्क्रमात्।।२५।।
एक राशि में २७ अंश १ अंश ६ कला और ४० विकला के होते हैं।
प्रत्येक राशियों में क्रम से चर राशि से आरम्भ होता है और उनके स्वामी
नक्षत्रेश होते हैं। शेष चक्र में देखिए।। २३-२५ ।।
उदाहरण- लग्न ९/१५/२२/३७ है। इसमें सिंह राशि यानि सूर्य
भांशपति हुआ और नक्षत्रेश त्वष्टा हुए।
भांशचक्रम्-
सं.स्वामीमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अ.क.वि.
:---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---:
अश्वि.कु.मी.१०१०१०४०
यम१११११११३२०
अग्नि१२१२१२२०
ब्रह्मा१०१०१०२६४०
चन्द्र१०१०१०३३२०
शंकर१०१०१०४०
अदिति१०१०१०४६४०
जीव११११११५३२०
अहि१२१२१२१०
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षोडशवर्गाध्यायः ५९

सं.स्वामीमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अ.क.वि.
१०पितर१०१०१०११४०
११यम१११११११२१३२०
१२अर्यमा१२१२१२१३२०
१३अर्क१०१०१०१४२६४०
१४त्वष्टा१११११११५३३२०
१५वायु१२१२१२१६४०
१६शक्राग्नि१०१०१०१७४६२०
१७मित्र१११११११८५३२०
१८वासव१२१२१२२०
१९निर्ऋति१०१०१०२१४०
२०उदक११११११२२१३२०
२१विश्वेदे१२१२१२२३२०
२२गोविंद१०१०१०२४२६४०
२३वसु११११११२५३३२०
२४वरुण१२१२१२२६४०
२५अजपात्१०१०१०२७४६४०
२६अहिर्बुध्न्य११११११२८५३२०
२७पूषा१२१२१२३०
अथ त्रिंशांशमाह—
त्रिंशांशेशाश्च विषमे कुजार्कीज्यज्ञभार्गवाः।
पञ्चपञ्चाष्टसप्ताक्षभागा व्यत्ययतः समे॥२६॥
वहिनः समीरशक्रौ च धनदो जलदस्तथा।
विषमेषु क्रमाज्ज्ञेया समराशौ विपर्ययम्॥२७॥
विषम राशि में भौम, शनि, गुरु, बुध और शुक्र का क्रम से ५, ५, ८, ७, ५
अंश और सम राशि में शुक्र, बुध, गुरु, शनि और भौम का क्रम से
५, ७, ८, ५, ५ अंश त्रिंशांश होता है। विषम राशि में क्रम से वहिन, वायु, इन्द्र,
धनद और जलद तथा सम राशि में जलद, धनद, इन्द्र, वायु और अग्नि
अधिपति होते हैं।। २६-२७ ।।
उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। लग्न सम है अतः गुरु का
त्रिंशांश हुआ और इन्द्र स्वामी हुए।

६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् विषमे त्रिंशांशचक्रम्— समराशौ त्रिंशांशचक्रम्—

अं.स्वामीमे.मि.सिं.तु.घ.कुं.वृ.क.क.वृ.म.मी.स्वामी
वह्निमं.मं.मं.मं.मं.मं.शु.शु.शु.शु.शु.शु.जलद
१०वायुश.श.श.श.श.श.१२बु.बु.बु.बु.बु.बु.घनद
१८इन्द्रबृ.बृ.बृ.बृ.बृ.बृ.२०बृ.बृ.बृ.बृ.बृ.बृ.इन्द्र
२५घनदबु.बु.बु.बु.बु.बु.२५श.श.श.श.श.श.वायु
३०जलदशु.शु.शु.शु.शु.शु.३०मं.मं.मं.मं.मं.मं.वह्नि

अथ खवेदांशमाह— चत्वारिंशतिभागानामधिपा विषमे क्रियात्। विष्णुश्चन्द्रो मरीचिश्च त्वष्टा धाता शिवो रविः ॥२८॥ यमो यक्षेशगन्धर्वः कालो वरुण एव च। समभे तुलतो ज्ञेयाः स्वस्वाधिपसमन्विताः ॥२९॥ विषम राशि में मेष से और सम राशि में तुला राशि से ४०वाँ अंश आरम्भ होता है। क्रम से विष्णु, चन्द्र, मरीचि, त्वष्टा, धाता, शिव, रवि, यम, यक्षेश, गंधर्व, काल, वरुण यही स्वामी होते हैं ।। २८-२९ ।। उदाहरण—लग्न ९।१५।२२।३७ है। एक चालीसवाँ अंश ४५ कला का होता है। इस हिसाब से २१वाँ भाग मिथुन राशि बुध का अंश और यक्षेश स्वामी हुए। खवेदांशचक्रम्—

सं.स्वामीमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.घ.म.कुं.मी.अं.क.
विष्णु०।४५
चन्द्रः१।३०
मरीचि२।१५
त्वष्टा१०१०१०१०१०१०३।०
धाता११११११११११११३।४५
शिव१२१२१२१२१२१२४।३०
रवि५।१५
यम६।०
यक्षेश६।४५
१०गंधर्व१०१०१०१०१०१०७।३०
११काल११११११११११११८।१५
१२वरुण१२१२१२१२१२१२९।०
१३विष्णु९।४५

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षोडशवर्गाध्यायः ६१ | सं. | स्वामी | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं. क. | | १४ | चन्द्र | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | १०।३० | | १५ | मरीचि | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ११।१५ | | १६ | त्वष्टा | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | १२।० | | १७ | धाता | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | १२।४५ | | १८ | शिव | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | १३।३० | | १९ | रवि | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | १४।१५ | | २० | यम | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | १५।० | | २१ | यक्षेश | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | १५।४५ | | २२ | गंधर्व | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १६।३० | | २३ | काल | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | १७।१५ | | २४ | वरुण | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १८।० | | २५ | विष्णु | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १८।४५ | | २६ | चन्द्र | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | १९।३० | | २७ | मरीचि | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | २०।१५ | | २८ | त्वष्टा | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | २१।० | | २९ | धाता | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | २१।४५ | | ३० | शिव | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | २२।३० | | ३१ | रवि | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | २३।१५ | | ३२ | यम | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | २४।० | | ३३ | यक्षेश | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | २४।४५ | | ३४ | गंधर्व | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | २५।३० | | ३५ | काल | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | २६।१५ | | ३६ | वरुण | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | २७।० | | ३७ | विष्णु | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | २७।४५ | | ३८ | चन्द्र | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २८।३० | | ३९ | मरीचि | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | २९।१५ | | ४० | त्वष्टा | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ३०।० | अथाक्षवेदांशमाह— तथाक्षवेदभागानामधिपाश्चलभे क्रियात्। स्थिरे सिंहाद्द्विस्वभावे चापाद्ब्रह्मेशकेशवाः। ईशाच्युतसुरज्येष्ठविष्णुकेशाश्चरादिषु ।।३०।। चर राशि में मेष से, स्थिर राशि में सिंह से और द्विस्वभाव राशि में धन राशि से गणना करने से अक्षवेदांश के स्वामी होते हैं और चर, स्थिर,

६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् द्विस्वभाव के क्रम से ब्रह्मा, शंकर, विष्णु; शंकर, विष्णु, ब्रह्मा; विष्णु, ब्रह्मा, शंकर ये स्वामी होते हैं॥३०॥ उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। ४० कला का एक भाग होता है, अतः २४वाँ मीन राशि अर्थात् गुरु का अक्षवेदांश हुआ और विष्णु स्वामी हुए। अक्षवेदांशचक्रम्—

ब्रह्माशं.वि.ब्र.शं.वि.ब्र.शं.वि.ब्र.शं.विष्णु
शंकरवि.ब्र.शं.वि.ब्र.शं.वि.ब्र.शं.वि.ब्रह्मा
विष्णुब्र.शं.वि.ब्र.शं.वि.ब्र.शं.वि.ब्र.शंकर
सं.मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अं.क.
४०
१०१०१०१०२०
११११११११
१२१२१२१२४०
२०
१०१०१०१०
११११११११४०
१२१२१२१२२०
१०१०१०१०१०४०
११११११११११२०
१२१२१२१२१२
१३४०
१४१०१०१०१०२०
१५१११११११११०
१६१२१२१२१२१०४०
१७११२०
१८१०१०१०१०१२
१९१११११११११२४०
२०१२१२१२१२१३२०
२११४
२२१०१०१०१०१४४०
२३१११११११११५२०
२४१२१२१२१२१६
२५१६४०

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षोडशवर्गाध्यायः ६३ | | ब्रह्मा | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | विष्णु | | | | | शंकर | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्रह्मा | | | | | विष्णु | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शंकर | | | | सं. | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं. | क. | | २६ | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | १७ | २० | | २७ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | १८ | ० | | २८ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | १८ | ४० | | २९ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | १९ | २० | | ३० | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | २० | ० | | ३१ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | २० | ४० | | ३२ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | २१ | २० | | ३३ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | २२ | ० | | ३४ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | २२ | ४० | | ३५ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | २३ | २० | | ३६ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | २४ | ० | | ३७ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | २४ | ४० | | ३८ | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २५ | २० | | ३९ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | २६ | ० | | ४० | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | २६ | ४० | | ४१ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | २७ | २० | | ४२ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | २८ | ० | | ४३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | २८ | ४० | | ४४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | २९ | २० | | ४५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ३० | ० | अथ षष्ट्यंशमाह- घोरश्च राक्षसो देवः कुबेरो यक्षकिन्नरौ। भ्रष्टः कुलघ्नो गरलो वह्निर्माया पुरीषकः ।।३१।। विषम राशि में १ घोर, २ राक्षस, ३ देव, ४ कुबेर, ५ यक्ष, ६ किन्नर, ७ भ्रष्ट, ८ कुलघ्न, ९ गरल, १० अग्नि, ११ माया, १२ यम (पुरीष) ।।३१।। अपाम्पतिर्मरुत्वांश्च कालः सर्पामृतेन्दुकाः। मृदुः कोमलहेरम्बब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।।३२।। १३ वरुण, १४ इन्द्र, १५ काल, १६ सर्प, १७ अमृत, १८ चन्द्रमा, १९ मृदु, २० कोयल, २१ हेरम्ब, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ शिव ।।३२।। देवाद्रौ कलिनाशश्च क्षितीशकमलाकरौ।