बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् वर्णदात्सप्तमाद्राशेः कलत्रायुः विचिन्तयेत्। पञ्चमे तनयस्यायुर्मातुः स्यात्तूर्यभावके ॥४०॥ वर्णद से पाँचवीं राशि से पुत्र की, चौथी राशि से माता की ॥४०॥ तृतीये भ्रातुरायुः स्याज्ज्येष्ठभ्रातुर्भवेद्द्विज। 'पितुस्तु नवमाद् भावादायुर्ज्ञेयं विचक्षणैः॥४१॥ तीसरी राशि से भाई की और ग्यारहवीं राशि से ज्येष्ठ भाई की, नवीं राशि से पिता की आयु का विचार करना चाहिए ॥४१॥ शूलराशिदशायां वै प्रबलायामरिष्टकम्। वर्णदाल्लग्नवच्चिन्त्यं फलं सर्वं विचक्षणैः ॥४२॥ शूलराशि की दशा में उन लोगों को प्रबल अरिष्ट होता है। वर्णद लग्न से लग्नभाव के समान ही सभी बातों का विचार करना चाहिए॥४२॥ एवं तन्वादिभावानां कारयेद्वर्णदा दशा। पूर्ववच्च फलं ज्ञेयं शुभाशुभं द्विजोत्तम ॥४३॥ इसी प्रकार लग्न आदि सभी भावों की वर्णद राशि बनाना चाहिए। उस पर से प्रत्येक भावों के शुभ-अशुभ फलों का विचार पूर्ववत् करना चाहिए ॥४३॥ ग्रहाणां वर्णदा नैव राशीनां वर्णदा दशा। यल्लब्धं पूर्वमब्दानां भानुभागं च कारयेत् ॥४४॥ ग्रहों की वर्णद राशि नहीं होती है। इस प्रकार वर्णद राशि के दशा का जो वर्ष मिले, उसमें १२ का भाग देकर ॥४४॥ क्रमव्युत्क्रमभेदेन संलिखेद्दै दशान्तरम्। चरस्थिरदशायां वै वर्णदायास्तथैव च॥४५॥ जैसे चर आदि दशा में क्रम-उत्क्रम से अन्तर्दशा लिखी जाती है उसी प्रकार यहाँ भी अन्तर्दशा लिखें॥४५॥ पूर्णायां कारकस्यैव केन्द्रस्थानां दशा भवेत्। ततः पणफरस्थानामापोक्लिम दशां ततः॥४६॥ पहले केन्द्रस्थ की दशा, इसके बाद पणफरस्थ की और इसके बाद आपोक्लिमस्थ की दशा होती है॥४६॥ पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां लग्नाध्याय चतुर्थः।