बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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३८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अष्टोत्तरीदशाज्ञानाय चक्रम्—
| सू. | चं. | मं. | बु. | श. | बृ. | रा. | शु. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | १५ | ८ | १७ | १० | १९ | १२ | २१ | वर्षाणि |
| आर्द्रा. | म. | ह. | अनु. | पू.षा. | घ. | उ.भा. | कृ. | |
| पु. | पू.फा. | चि. | ज्ये. | उ.षा. | श. | रो. | रो. | |
| पु. | उ.फा. | स्वा. | मू. | ध. | पू.भा. | अ. | मृ. | |
| श्ले. | वि. | श्र. | भ. | |||||
| ७२ | १८० | ९६ | २०४ | १२० | २२८ | १४४ | २५२ | मासाः |
| विशेष— यहाँ दशा के भुक्त-भोग्य के लाने में भभोग और दशा वर्ष | ||||||||
| का मान इस प्रकार लेना चाहिए। नक्षत्र का जितना चरण बीत गया | ||||||||
| हो उतना भभोग में से घटाकर शेष को भभोग मानना चाहिए। जैसे किसी | ||||||||
| का जन्म नक्षत्र के दूसरे चरण में है और भभोग ६४।१६ है और | ||||||||
| भभोग का चतुर्थांश १६।४ एक चरण का मान हुआ। इसे भभोग में घटा | ||||||||
| देने से ४८।१२ यही भभोग हुआ, क्योंकि एक चरण बीतने के बाद जन्म | ||||||||
| हुआ है। इसी प्रकार जिस ग्रह की दशा में जन्म हो उसके वर्ष का | ||||||||
| भी ४ या ३ भाग करके अर्थात् उस ग्रह की दशा ४ नक्षत्रों की हो तो | ||||||||
| ४ भाग अन्यथा ३ भाग कर दशावर्ष लेना चाहिए। जैसे सूर्य की दशा चार | ||||||||
| नक्षत्रों की है और उसका दशावर्ष ६ है, अतः एक नक्षत्र का दशामान | ||||||||
| १८ मास हुआ, इससे भयात को गुणा कर भभोग का भाग देने से भुक्त | ||||||||
| वर्षादि आते हैं। | ||||||||
| अथ पञ्चोत्तरीदशामाह— | ||||||||
| पातौ विनानुराधादि विज्ञेयं जन्मभावधि। | ||||||||
| गणयेत्सप्तभिर्भक्ते शेषे कल्या दशा शुभाः॥१२८॥ | ||||||||
| पात (राहु-केतु) को छोड़कर अनुराधा से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ७ | ||||||||
| से भाग देने से शेष तुल्य क्रम से॥१२८॥ | ||||||||
| रविज्ञार्कसुतो भौमो भार्गवो रजनीकरः। | ||||||||
| वाक्पतिश्च कर्काङ्गे तस्यैव द्वादशाङ्गके ॥१२९॥ | ||||||||
| सूर्य, बुध, शनि, भौम, शुक्र, चन्द्रमा और गुरु की दशा होती है। किन्तु | ||||||||
| कर्क लग्न और उसी के द्वादशांश में जन्म हो तो पंचोत्तरी दशा लेनी | ||||||||
| चाहिए॥१२९॥ |