भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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पृष्ठ 378

३८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अष्टोत्तरीदशाज्ञानाय चक्रम्—

सू.चं.मं.बु.श.बृ.रा.शु.ग्रहाः
१५१७१०१९१२२१वर्षाणि
आर्द्रा.म.ह.अनु.पू.षा.घ.उ.भा.कृ.
पु.पू.फा.चि.ज्ये.उ.षा.श.रो.रो.
पु.उ.फा.स्वा.मू.ध.पू.भा.अ.मृ.
श्ले.वि.श्र.भ.
७२१८०९६२०४१२०२२८१४४२५२मासाः
विशेष— यहाँ दशा के भुक्त-भोग्य के लाने में भभोग और दशा वर्ष
का मान इस प्रकार लेना चाहिए। नक्षत्र का जितना चरण बीत गया
हो उतना भभोग में से घटाकर शेष को भभोग मानना चाहिए। जैसे किसी
का जन्म नक्षत्र के दूसरे चरण में है और भभोग ६४।१६ है और
भभोग का चतुर्थांश १६।४ एक चरण का मान हुआ। इसे भभोग में घटा
देने से ४८।१२ यही भभोग हुआ, क्योंकि एक चरण बीतने के बाद जन्म
हुआ है। इसी प्रकार जिस ग्रह की दशा में जन्म हो उसके वर्ष का
भी ४ या ३ भाग करके अर्थात् उस ग्रह की दशा ४ नक्षत्रों की हो तो
४ भाग अन्यथा ३ भाग कर दशावर्ष लेना चाहिए। जैसे सूर्य की दशा चार
नक्षत्रों की है और उसका दशावर्ष ६ है, अतः एक नक्षत्र का दशामान
१८ मास हुआ, इससे भयात को गुणा कर भभोग का भाग देने से भुक्त
वर्षादि आते हैं।
अथ पञ्चोत्तरीदशामाह—
पातौ विनानुराधादि विज्ञेयं जन्मभावधि।
गणयेत्सप्तभिर्भक्ते शेषे कल्या दशा शुभाः॥१२८॥
पात (राहु-केतु) को छोड़कर अनुराधा से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ७
से भाग देने से शेष तुल्य क्रम से॥१२८॥
रविज्ञार्कसुतो भौमो भार्गवो रजनीकरः।
वाक्पतिश्च कर्काङ्गे तस्यैव द्वादशाङ्गके ॥१२९॥
सूर्य, बुध, शनि, भौम, शुक्र, चन्द्रमा और गुरु की दशा होती है। किन्तु
कर्क लग्न और उसी के द्वादशांश में जन्म हो तो पंचोत्तरी दशा लेनी
चाहिए॥१२९॥