बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ३७९ अथ द्वादशोत्तरीदशाचक्रम्— | सू. | बृ. | के. | बु. | रा. | मं. | श. | चं. | ग्रहाः | | ७ | ९ | ११ | १३ | १५ | १७ | १९ | २१ | वर्षाणि | इति द्वादशोत्तरीदशाक्रमः। अथाष्टोत्तरीदशामाह— सूर्य्यश्चन्द्रः कुजः सौम्यः शनिर्जीवस्तमो भृगुः। एते दशाधिपाः प्रोक्ता विकेतुश्च नवग्रहाः॥२३॥ केतु को छोड़कर नवग्रहों में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, शनि, गुरु, राहु और शुक्र दशा के स्वामी होते हैं॥२३॥ रसाः पञ्चेन्दवो नागाः शैलचन्द्रनभेन्दवः। गोब्जाः सूर्यकुनेत्राश्च समाः प्रद्योतनादयः॥२४॥ इनके ६, १५, ८, १७, १०, १९, १२, २१ ये क्रम से सूर्यादि के दशावर्ष होते हैं॥२४॥ लग्नेशात्केन्द्रकोणस्थे राहौ लग्ने सितं विना। अष्टोत्तरी दशा प्रोक्ता शिवाद्या द्विजसत्तम॥२५॥ यदि लग्नेश से केन्द्र-त्रिकोण में राहु हो और लग्न में शुक्र हो तो अष्टोत्तरी दशा लेनी चाहिए। इसका आरम्भ आर्द्रा नक्षत्र से आरम्भ कर अपने जन्मनक्षत्र तक गिनना चाहिए॥२५॥ चतुष्कं त्रितयं तस्माच्चतुष्कं त्रितयं पुनः। यावत्स्वजन्मभं तावद्गणयेच्च यथाक्रमात्॥२६॥ आर्द्रा से चार नक्षत्र के अन्तर्गत अपना जन्मनक्षत्र हो तो सूर्य की दशा, इसके बाद ३ नक्षत्र में चन्द्रमा की, इसके बाद के चार नक्षत्रों में भौम की, इसके बाद ३ नक्षत्र में बुध की, इसके बाद ४ नक्षत्र में शनि की, इसके बाद ३ नक्षत्र में गुरु की, इसके बाद ४ नक्षत्र में राहु की और शेष ४ नक्षत्र में शुक्र की दशा होती है॥२६॥ अष्टोत्तरी द्विधा प्रोक्ता शिवादि कृत्तिकादितः। लग्ने सग्रहे शैवाद् विग्रहे कृत्तिकादितः॥२७॥ अष्टोत्तरी दशा दो प्रकार की होती है। यदि लग्न में कोई ग्रह हो तो आर्द्रा नक्षत्र से और यदि कोई ग्रह न हो तो कृत्तिका से गणना करना चाहिए॥२७॥ नोट— दशा का भुक्त-भोग्य साधन पूर्ववत् करना चाहिए।