बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें३९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् .दशारम्भज्ञानप्रकारमाह- ये जीवा अंशके जाता गतनाडीपलेन तु। तदंशस्य हताङ्कस्तु पञ्चभूमिविभाजिताः॥८७॥ मनुष्य का जन्म नक्षत्र के जिस चरण में हो उसके गत घटी-पल को उसके वर्ष संख्या से गुणाकर गुणन फल में १५ का भाग देने से॥८७॥ एवं महादशारम्भे सूर्यादीनां यथाक्रमात्। गणयेन्नवपर्यन्तमायुष्यं तत्प्रकीर्त्तितम्॥८८॥ लब्धि दशा का भुक्त वर्षादि होता है। इसे दशावर्ष में घटाने से भोग्य वर्षादि होता है। इस प्रकार से दशा का आरम्भ होता है॥८८॥ .उदाहरण- किसी का पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म है। पुनर्वसु सव्य नक्षत्र है। उसका देहाधिपति भौम और जीवाधिपति गुरु है। पुनर्वसु का भभोग ५५।५२ भयात ३२।१० है। भभोग का चार भाग करने से एक भाग घट्यादि १३।४८।१५ हुआ। यही एक चरण का मान है। इसे दूना कर भयात से घटाने से शेष ४।१३।३० यह पुनर्वसु के तीसरे चरण की भुक्त घट्यादि है। इसका दशा वर्ष १०० है, इससे शेष घट्यादि को गुणा करने से ४००।१३००।३००० सवर्णन करने से ४२२।३०।१० हुआ। इसमें १५ का भाग देने से २८।३।१८ वर्षादि जन्मकाल में भुक्त हुआ। पुनर्वसु सव्य गणना में है, देहादि जीव पर्यन्त गणना होगी। अतः पुनर्वसु प्रथम चरण में देह मेष और जीव धनु है। अतः भुक्त वर्षादि २८।३।१८ में मेष से वृष पर्यन्त के योग-वर्ष २३ को घटाने से ५।३।१८ यह वर्षादि मिथुन के भुक्त वर्षादि हुए। अतः इसे बुध के वर्षमान ९ से घटाने से ३।८।४२ वर्षादि भोग्य हुआ। अतः विंशोत्तरी दशा के समान ही मिथुन आदि दशा का क्रम हुआ। शेष चक्र से स्पष्ट है। कालचक्रदशा-
| मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | मे. | वृ. | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ५<br>३<br>१८ | २१ | ५ | ९ | १६ | ७ | १० | ७ | १६ | |
| २०१३ | २०१८ | २०३९ | २०४४ | २०५१ | २०६२ | २०७४ | २०८४ | २०९१ | २१०७ |
| ३ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ |
| १८ | ०६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ |