बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ४०३ यद्यपि उच्चस्थ ग्रह अल्पवर्ष देने वाला हो तथापि वही बली होता है। वहाँ स्वामी पर्यन्त दशावर्ष लेना चाहिए।।१९।। उच्चखेटस्य सद्भावे वर्षमेकं तु निःक्षिपेत्। तथैव नीचखेटस्य वर्षमेकं त्यजेद्द्विज।।२०।। उच्चस्थ ग्रह के वर्ष में १ जोड़ देना चाहिए और नीचस्थ ग्रह में १ वर्ष कम करना चाहिए।।२०।। एकः स्वक्षेत्रगो अन्यस्तु परत्र यदि संस्थितः। तदान्यत्र स्थितं नाथं परिगृह्य दशां नयेत्।।२१।। यदि एक ग्रह अपनी राशि में हो और दूसरा अन्य राशि में हो तो वहाँ अन्यत्र स्थित ग्रह के स्वामी से दशावर्ष लेना चाहिए।।२१।। एकः स्वोच्चगतस्त्वन्यः परत्र यदि संस्थितः। ग्राहयेदुच्चखेटस्थं राशिमन्यं विहाय वै।।२२।। एक ग्रह अपने उच्च में हो और दूसरा अन्यत्र हो तो वहाँ उच्चस्थ ग्रह की राशि को अन्य ग्रह की राशि को छोड़कर लेना चाहिए।।२२।। चरदशाफलमाह— एवं सर्वं समालोच्य दशायां निधनं वदेत्। पापयोगे पापदृष्ट्या यस्य पापत्रिकोणगाः ।।२३।। इस प्रकार सभी पदार्थों का विचार कर निधन को कहना। जिस दशा की राशि में पापग्रह का योग हो अथवा दृष्टि हो वा पापग्रह से त्रिकोण में हो तो।।२३।। निधनं तद्दशायां वै भाषितं ब्रह्मणा यथा। चरमुख्यदशायास्ते कथयिष्याम्यहं फलम्।।२४।। उस दशा में अवश्य मृत्यु होती है, ऐसा ब्रह्मा ने कहा है। इस प्रकार चर दशा का फल मैंने कहा।।२४।। उदाहरण— जन्मांग के अनुसार जन्मलग्न मकर सम राशि है, अतः ६ उत्क्रम गणनां से मकर से दशा का आरम्भ हुआ और उसका दशांवर्ष ३ हुआ। कुम्भ का शनिपर्यन्त ३ वर्ष, मीन का ७ वर्ष, मेष ओज राशि है, अतः क्रम गणना से मेष का १० वर्ष, वृष का १ वर्ष, मिथुन का २ वर्ष। इसी प्रकार अन्य राशियों के दशावर्ष भी लाना चाहिए, शेष चक्र से स्पष्ट है।