बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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४०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् | १२ | मं. ११ | ९ | | १ | १० | श. ८ रा. | | २ के. | ४ सू. | ७ | | चं. ३ शु. | ५ बृ. बु. | ६ | चरदशाचक्रम्
| म. | ध. | वृ. | तु. | क. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | कुं. | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | ८ | ९ | ४ | ११ | ११ | १० | २ | १ | १० | ७ | ३ | वर्ष |
| २०१५ | २०२३ | २०३२ | २०३६ | २०४७ | २०५८ | २०६८ | २०७० | २०७१ | २०८१ | २०८८ | २०९१ | संवत् |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | सूर्य |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | |
| अथ नवांशस्थिरदशा- | ||||||||||||
| अधुना सम्प्रवक्ष्यामि दशास्थिरविशेषतः। | ||||||||||||
| नवांशकदशामानं तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२५।। | ||||||||||||
| पाराशरजी ने कहा- हे द्विजोत्तम ! अब मैं तुमसे स्थिर दशा के मध्य | ||||||||||||
| में नवांशक दशा को कहता हूँ।।२५।। | ||||||||||||
| प्रतिराशिप्रदिष्टैवमङ्काङ्का च दशा स्थिरा। | ||||||||||||
| तन्वादिव्ययभावानां स्पष्टीकृत्वा द्विजोत्तम ।।२६।। | ||||||||||||
| लग्नादि द्वादश भावों को स्पष्ट करना चाहिए। प्रत्येक राशि में नव | ||||||||||||
| नवमांश होते हैं, इन्हीं की दशा को स्थिर दशा कहते हैं।।२६।। | ||||||||||||
| ग्रहनवांशायुरीत्या दशातुल्या नवांशका। | ||||||||||||
| अस्थिरा इति विज्ञेया परपक्षमिदं क्रमात् ।।२७।। | ||||||||||||
| इसे दो प्रकार की कोई-२ कहते हैं। एक राशि से और दूसरी ग्रह नवांश | ||||||||||||
| से दशा होती है।।२७।। | ||||||||||||
| पक्षद्वयं प्रवक्ष्यामि चरस्थिरं द्विजोत्तम। | ||||||||||||
| पूर्वं चरदशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२८।। |