बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ४०५ इसमें भी दो प्रकार है, पहला चर और दूसरा स्थिर दशा। उसमें प्रथम प्रकार को कहता हूँ।।२८।। ओजलग्ने जनुर्यस्य नवांशकदशा द्विज। लग्नादिकं समारभ्य तस्य चांशदशा मता।।२९।। जिसका जन्म विषम राशिलग्न में हो उसकी नवांश दशा लग्न से क्रम गणना के अनुसार होती है।।२९।। समराशौ जनुर्यस्य नवांशकदशा द्विज। व्युत्क्रमाच्च समारभ्य पुरा शम्भुप्रचोदितम्।।३०।। और जिसका जन्म लग्न समराशि हो उसकी दशा उत्क्रम गणना के अनुसार होती है।।३०।। दशाप्रवर्त्तको राशिः विषमर्क्ष समोऽपि वा। राशिप्रतिनवाङ्कानां सर्वेषां गणयेत्क्रमात्।।३१।। अष्टोत्तरशताङ्कानां संख्यापूर्वं तदंशकाः। ख्याता स्थिरदशा विप्र निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।३२।। दशाप्रवर्त्तक राशियों का दशावर्ग ९ वर्ष ही होता है, चाहे वे विषम हों वा सम हों। इस प्रकार सभी वर्षों का योग १०८ वर्ष होता है।।३२।। उदाहरण— पूर्वोक्त जन्मकुंडली में जन्मलग्न मकर समराशि है, अतः उत्क्रम गणना द्वारा दशा होगी। चक्र देखिए। नवांशकस्थिरदशाचक्रम्
| म. | ध. | वृ. | तु. | क. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | कुं. | रा. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | व. |
| २०१३ | २२ | ३१ | ४० | ४९ | ५८ | ६७ | ७६ | ८५ | ९४ | २१०३ | १२ | २१ |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ |
अथ स्थिरदशामाह— अधुना सम्प्रवक्ष्यामि स्थिरदशां द्विजोत्तम। चरस्थिरद्विस्वभावा राशयो त्रिविधाः क्रमात्।।३३।।