बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् हे द्विजोत्तम ! अब मैं स्थिर दशा को कह रहा हूँ। चर, स्थिर, द्विस्वभाव ये तीन प्रकार की राशियाँ हैं।।३३।। सप्ताष्टनवाङ्काभ्याम् आनयीत दशां स्थिराम् ।।३४।। इसमें क्रम से ७, ८, ९ वर्ष के प्रमाण से दशा लानी चाहिए।।३४।। मेषे सप्ताङ्कं विज्ञेया वृषे वसुसमा द्विज। मिथुने नव वर्षाणि कर्केत्यादि यथाक्रमम् ।।३५।। जैसे मेष का ७ वर्ष, वृष का ८ वर्ष और मिथुन का ९ वर्ष प्रमाण होता है। इसी प्रकार आगे भी कर्क आदि का जानना।।३५।। द्वादशराशिपर्यन्तं ज्ञायतेऽङ्का द्विजोत्तम। षण्णवति समासंख्या जायते द्विजसत्तम।।३६।। बारह राशियों के वर्षों का योग ९६ वर्ष होता है।।३६।। एषा स्थिरदशा प्रोक्ता तस्या चापि प्रवर्त्तकम्। ब्रह्मग्रहाश्रितारम्भस्तदग्रे पूर्ववत्क्रमः ।।३७।। यह स्थिर दशा है और ब्रह्मग्रह से आरम्भ होती है।।३७।। अथ ब्रह्मग्रहलक्षणमाह- षष्ठाष्टमव्ययेशानां मध्ये यश्च बली ग्रहः। स चेद्विषमर्क्षे स्तः सैव ब्रह्मा भविष्यति ।।३८।। छठे, आठवें और बारहवें भावों के स्वामियों में जो बलवान् हो वह यदि विषमराशि में हो तो वही ब्रह्मग्रह होता है।।३८।। लग्नसप्तमयोर्मध्ये यो राशिः बलवान्भवेत् । तस्यानुचरराशीशो ओजे ब्रह्मग्रहो भवेत् ।।३९।। लग्न और सातवें भाव में जो बली हो उसका अनुचर (अर्थात् उस भाव से पीछे ६ राशि के अन्दर जो ग्रह हो, वह) यदि विषमराशि में हो तो वही ब्रह्मा होता है।।३९।। मध्ये शनिपातानां च यदि ब्रह्मस्य सम्भवः । तदा तस्माच्च षष्ठेशो ब्रह्मग्रहःसुनिश्चितम् ।।४०।। शनि, राहु और केतु में से कोई भी ब्रह्मा होता हो तो उससे षष्ठेश ब्रह्मा होता है।।४०।। बहूनां ब्रह्मसद्भावेऽधिकांशो भवेद्विधिः । तत्र राहुसमायोगेऽल्पांशो ब्रह्मणो भवेत् ।।४१।।