बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकेन्द्रग्रहदशामाह- लग्नाद्वा सप्तमाद्विप्र गणनीयः क्रमोत्क्रमात् ।।४८ ।। कारकावधिराशिश्च संख्या तत्रात्मिकाः समाः ।।४८ ।। लग्न या सप्तम से क्रम वा उत्क्रम रीति से गणना करना चाहिए। कारक पर्यन्त राशियों का दशावर्ष होता है।।४८।। कारकग्रहदशा विप्र अन्येषां तु व्यतिक्रमः। ग्रहात्कारकपर्यन्तं विषमसमविरोधतः ।।४९ ।। कारक ग्रह की दशा इस प्रकार होती है। ग्रह से कारक पर्यन्त विषम- सम के विरोध से क्रम-उत्क्रम के भेद से दशावर्ष को जानना चाहिए।।४९।। क्रमव्युत्क्रमभेदेन गणनीयं प्रयत्नतः। संख्या समा इहाब्दाश्च पुरा शम्भुप्रणोदिताः ।।५० ।। कारक से युक्त ग्रह की दशा की संख्या कारक के तुल्य ही होती है। अन्य कारकों के दशावर्ष लग्न से कारक पर्यन्त संख्या को लेना चाहिए।।५०।। कारक्युक्तग्रहाणां तु कारकतुल्याङ्कसंख्यया। संग्राह्याश्च समा विप्र पूर्वोक्तेन दशाक्रमः ।।५१ ।। उनके साथ जो ग्रह हों उनका दशावर्ष भी उन्हीं के तुल्य लेना चाहिए।।५१।। लग्नात्कारकपर्यन्तं संख्यां न्यस्य दशा भवेत्। गणनीयं प्रयत्नेन समालब्धदशां नयेत् ।।५२ ।। दोनों में जो अधिक संख्या हो वही कारक के दशावर्ष की संख्या होती है।।५२।। तद्युक्तानां तुल्याङ्काः प्रत्येकं स्युर्दशाक्रमात्। उभयोरधिकं संख्या कारकस्य दशासमाः ।।५३ ।। कारकस्य युतश्चादौ तत्केन्द्रादिस्थितस्ततः। दशाक्रमेण विज्ञेयाः शुभाशुभफलप्रदाः ।।५४ ।। पहले कारक की, उसके बाद उससे युत ग्रह की, उसके बाद उससे पणफरस्थ की, उसके बाद उससे आपोक्लिमस्थ की दशा होती है।।५४।।