बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 407, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ४०९ गहेन्द्राणामप्येवं स्वकारकाच्च दशां नयेत्। ओजसमविभेदाच्च गणनात्रापि कारयेत्॥४७॥ यह लग्न की केन्द्रादि दशा हुई। इसी प्रकार आत्मकारक ग्रह से भी केन्द्रादि राशियों की दशा होती है, किन्तु विषम-सम राशि के अनुसार क्रम-उत्क्रम से गणना होती है। अर्थात् कारक ग्रह यदि विषम राशि में हो तो केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम की और समराशि में हो तो केन्द्र, आपोक्लिम, पणफर की दशा क्रम से होती है। इसी प्रकार भावों में बैठे हुए ग्रहों की भी दशा होती हैं॥४७॥ विशेष— केन्द्र दशा के दो भेद हैं। प्रथम लग्न से केन्द्रस्थित राशियों का और दूसरा कारक से केन्द्रस्थित राशियों का। इसमें भी प्रथम प्रकार में लग्न से केन्द्र स्थित राशियों में जो सबसे बलवान् हो उसकी सर्वप्रथम, उसके बाद उत्तरोत्तर न्यूनबली की दशा होती है। इसके बाद पणफरस्थ राशि की इसके बाद आपोक्लिमस्थ राशि की दशा होती है। यहाँ भी विषम-समराशि के अनुसार ही क्रम-उत्क्रम गणना केन्द्रादि में करनी चाहिए। राशियों के वर्ष क्रम दशा के समान ही लेना चाहिए। दूसरे प्रकार में यदि कारक विषम राशि में हो तो कारक से केन्द्र, पणफर और आपोक्लिम की और समराशि में हो तो केन्द्र, आपोक्लिम और पणफर की स्थित राशियों की दशा होती है। उदाहरण— पीछे दिये हुए उदाहरण के जन्मांग में आत्मकारक भौम कुम्भ राशि में और उससे सप्तम सिंह राशि, दोनों में बली कुम्भ राशि है, अतः कुम्भराशि से ही दशा आरम्भ होगी। इसके बाद कारक से केन्द्रस्थित राशि कुम्भ, वृष, सिंह, वृश्चिक में बलक्रम से दशा होगी, इसके बाद पणफरस्थ मकर, मेष, कर्क, तुला राशि की, इसके बाद धन, मीन, मिथुन और कन्या राशि की बलक्रम से दशा होगी। कारककेन्द्रदशाचक्रम्—
| कुं. | वृ. | सिं. | वृ. | म. | मे. | तु. | क. | ध. | मी. | मि. | कं. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | १ | ११ | ९ | २ | १० | ४ | १० | ८ | ७ | २ | ११ |
| २०१५ | १८ | १९ | ३० | ३९ | ४१ | ५१ | ५५ | ६५ | ७३ | ८० | ८२ | ९३ |
| ३ | ३ | ||||||||||
| १८ | १८ |