भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

४०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् समलग्ने यदा जन्म विधेः सप्तमराशितः । व्युत्क्रमाच्च दशानेया एषा ब्रह्मदशा मता ॥४४॥ यदि समलग्न में जन्म हो तो ब्रह्मग्रहाश्रित राशि से जो सातवीं राशि है उससे विलोम राशियों की दशा होती है। यहाँ भी वर्षसंख्या पूर्ववत् ही लेना चाहिए। इसे ब्रह्मग्रहदशा कहते हैं॥४४॥ उदाहरण— पूर्वोक्त कुंडली में जन्मलग्न सम है, अतः ब्रह्मग्रह गुरु से सातवीं राशि कुम्भ है, उसी से विलोम राशियों की कुंभ, मकर, धन आदि की दशा होगी। दशा वर्ष के विचार से कुम्भ से छठी राशि कर्क है, इसके स्वामी चन्द्रमा हैं जो कि छठे भाव में है, अतः कुंभ से गणना करने से ५ वर्ष कुंभ के हुए। इसी प्रकार मकर से छठी राशि मिथुन है, इसके स्वामी बुध आठवें भाव में हैं, यहाँ तक गिनने से ७ वर्ष मकर के हुए। इसी प्रकार शेष राशियों के वर्ष को भी जानना। शेष चक्र से स्पष्ट है। ब्रह्मदशाचक्रम्—

मं.ल.श.बु.<br>बृ.सू.चं.<br>शु.ग्रहाः
कुं.म.ध.वृ.तु.क.सिं.कं.मि.वृ.मे.मी.राशयः
१०वर्षाणि
२०१३१८२५३१३४४४४७५०५१५९६०६४२०६९
३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८३/१८
अथ केन्द्रदशामाह—
लग्नास्तभावयोर्मध्ये यो राशिर्बलवान् द्विज ।
ततः केन्द्रादिस्थितानां राशीनां च बलक्रमात् ॥४५॥
लग्न और सप्तम में जो बली राशि हो उससे आरम्भ कर पहले केन्द्रस्थ
राशियों की उनके बल के अनुसार, इसके बाद पणफरस्थ राशियों की,
इसके बाद आपोक्लिमस्थ राशियों की दशा होती है॥४५॥
केन्द्रादिस्थितराशीनां दशा ज्ञेया द्विजोत्तम ।
दशाब्दांश्चात्र भो विप्र चरवच्च समादिशेत् ॥४६॥
यहाँ राशियों का दशावर्ष चरदशा के समान ही लेना चाहिए॥४६॥