बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५१ सूर्य की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में बैठे हुये चन्द्रमा के अन्तर में विवाह, शुभ कार्य, धन, धान्य और समृद्धि का लाभ॥२१॥ गृहक्षेत्राभिवृद्धिं च पशुवाहनसम्पदाम् । तुङ्गे वा स्वर्शगे वापि दारसौख्यं धनागमम् ॥२२॥ गृह क्षेत्र की वृद्धि, पशु वाहन और सम्पत्ति की वृद्धि होती है॥२२॥ पुत्रलाभसुखं चैव सौख्यं राजसमागमम् । महाराज प्रसादेन इष्टसिद्धि सुखावहम् ॥२३॥ चन्द्रमा अपने उच्च अपनी राशि में हो तो स्त्री का सुख, धन का आगम और महाराजा की कृपा से अभीष्ट सिद्ध होता है॥२३॥ क्षीणे वा पापसंयुक्ते दारपुत्रादि पीडनम् । वैषम्य जन सम्वादं भृत्यवर्गविनाशनम् ॥२४॥ यदि चन्द्रमा क्षीण हो वा पापग्रह से युक्त हो तो उसके अन्तर में स्त्री पुत्रादि को कष्ट, लोगों से झगड़ा, नौकरों की हानि होती है॥२४॥ विरोधं राजकलहं धनधान्यपशुक्षयम् । षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे जलभीतिं मनोरुजम् ॥२५॥ राजा से कलह, धन धान्य और पशु की हानि होती है। ६।८।१२ भाव में चन्द्रमा हो तो जल भय, मानसिक कष्ट॥२५॥ बन्धनं रोगपीडां च स्थानविच्युतिकारकम् । दुःस्थानं चापि चित्तेन दायादजनविग्रहम् ॥२६॥ बन्धन, रोग पीड़ा, स्थान च्युति, दुष्ट स्थान की यात्रा, दायादों से विग्रह॥२६॥ निर्धनं कुत्सितान्नं च चौरादिनृपपीडनम् । मूत्रकृच्छ्रादिरोगश्च देहपीडा क्षयो भवेत् ॥२७॥ निर्धनता, खराब अन्न का भोजन, चोर तथा राजा से पीड़ा, मूत्रकृच्छ्र (सूजाक) रोग और क्षयरोग से कष्ट होता है॥२७॥ दायेशाल्लाभभाग्ये च केन्द्रे वा शुभसंयुते । भोगभाग्यादिसंतोषदारपुत्रादिवर्धनम् ॥२८॥ दशा के स्वामी से ११ वा ९ भाव में चन्द्रमा हो अथवा केन्द्र में वा शुभग्रह से युत हो तो अपने अन्तर में भोग, भाग्य, संतोष स्त्री आदि की वृद्धि करता है॥२८॥