बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सरोगेशविलग्नेशः शनिषड्वर्गगो यदि । तस्य भुक्तौ भवेद्वातः सन्निपातोऽथवानृणाम् ।।१९५।। रोगेश से युत लग्नेश शनि के षड्वर्ग में हो तो इसके अन्तर में वातरोग वा सन्निपात रोग होता है।।१९५।। मृत्युस्थितैःसैंहिकमन्दकेतुभिर्मनोह्रिकाश्वासविषूचिकामिः। रोगोनराणामथ तस्यभुक्तौ भवेद्यदामारक संयुतिश्च।।१९६।। यदि आठवें भाव में राहु, शनि, केतु और मारकेश से युत हों तो इनके अन्तर में काशश्वास रोग वा विषूचिका होता है।।१९६।। एवं भ्रात्रादि भावानां नायको यत्र संस्थितः । तत्तत्षड्वर्गयोगेन तत्तद्भावफलं वदेत् ।।१९७।। भ्रातृ आदि स्थानों के स्वामी और उनके षड्वर्ग के अनुसार उनकी दशा अन्तर में उनके फलों को कहना चाहिये।।१९७।। उच्चक्षेत्रगते सूर्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वदाये च स्वभुक्तौ च धनधान्यादिलाभकृत् ।।१९८।। यदि सूर्य अपनी उच्च राशि में अथवा अपनी राशि में होकर केन्द्र वा त्रिकोण में हो तो उसकी दशा व अन्तर में धन धान्य का लाभ होता है।।१९८।। देहरोगं वित्तलाभं राजप्रीतिकरं शुभम् । सर्वकार्यार्थसिद्धिः स्याद् विवाहं राजदर्शनम् ।।१९९।। देह में रोग, धन का लाभ, राजा से प्रियता होती है, सभी कार्य और धन की सिद्धि, विवाह और राजा का दर्शन होता है।।१९९।। द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् ।। सूर्यप्रीतिकरीं शान्तिं कुर्यादारोग्यप्राप्तये ।।२००।। यदि सूर्य दूसरे और सातवें भाव का स्वामी हो उसकी दशा और अन्तर में अकाल मृत्युभय होता है अनिष्ट फल की शान्ति के लिये मृत्युंजय मन्त्र का जप और सूर्य के प्रसन्नार्थ शान्ति करने से आरोग्यता होती है।।२००।। सूर्यस्यान्तर्गते चन्द्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । विवाहं शुभकार्यं च धनधान्यसमृद्धिकृत् ।।२०१।।