भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 800 में से

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अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४४९ विलग्नवाथस्थितमांशनाथे मित्रांशगे मित्रखगेन दृष्टे। सुहृदृष्काणस्यनवांशके वा तदास्य भुक्तिं शुभदा वदंति॥८८॥ लग्नेश जिस राशि नवांश में है उसका स्वामी अपने मित्र के नवांश में हो और मित्र ग्रह से देखा जाता हो अथवा अपने मित्र के द्रेष्काण वा नवांश में हो तो उसका अन्तर शुभद होता है॥८८॥ अथ वक्ष्ये विशेषेण दशा कष्टप्रदा नृणाम् । षष्ठाष्टमव्ययेशानां दशा कष्ट प्रदायिनी ॥८९॥ अब विशेषतः कष्टप्रद दशा और अन्तर को कह रहा हूँ। ६।८।१२ भावों के स्वामियों की दशा कष्टप्रद होती है॥८९॥ एषां भुक्तिर्हि कष्टा स्यान्मारकस्य दशायदि । मारकेशेन षष्ठेशे युक्ते लग्नाधिपे यदि ॥९०॥ यदि ये मारकेश की दशा में इनका अंतर भी कष्ट देनेवाला होता है। मारकेश के लग्नेश युत हो तो॥९०॥ तस्य भुक्तौ ज्वरप्राप्तिं प्राहुः कालविदो जनाः । सरोगेश शरीरेशश्चन्द्रषड्वर्गगो यदि ॥९१॥ इसके अन्तर में ज्वर होता है। षष्ठेशयुक्त लग्नेश चन्द्रमा के वर्ग में हो तो॥९१॥ जलदोषस्तस्य भुक्तौ स्यादजीर्णो न संशयः । षष्ठेशयुतलग्नेशो बुध षड्वर्गगो यदि ॥९२॥ इसके अन्तर में जलंधर या अजीर्ण रोग से कष्ट होता है॥९२॥ तस्य भुक्तौ भवेद्वायुर्वातो वा देहजाड्यकृत् । सारिनाथविलग्नेशो गुरु षड्वर्गगो यदि ॥ तस्य भुक्तौ भवेद्रोगः पीडा वा ब्राह्मणेन तु ॥९३॥ षष्ठेश से युत लग्नेश बुध के षड्वर्ग में हो तो॥९३॥ सषष्ठेश विलग्नेशो भृगु षड्वर्गगो यदि । तस्य भुक्तौ भवेत्पीडा रोगस्त्रीसंगमेन च ॥९४॥ इसके अन्तर में वायु वा बात से शरीर जकड़ जाता है। षष्ठेश से युत लग्नेश गुरु के षड्वर्ग में हो तो इसके अन्तर में रोग वा ब्राह्मण से पीड़ा होती है। षष्ठेश से युक्त लग्नेश शुक्र के षड्वर्ग में हो तो इसके अन्तर में पीड़ा या स्त्री प्रसंग से रोग होता है॥९४॥

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