बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । कर्क वा वृश्चिक वा कन्या वा धन में राहु हो तो राहु की दशा में राहु के ही अन्तर में राजा से सम्मान, वस्त्र, वाहन का लाभ होता है।।२३०।। व्यवसायात्फलाधिक्यं चतुष्पाज्जीवलाभकृत् । प्रयाणं पश्चिमे भागे वाहनाम्बरलाभकृत् ।।२३१।। व्यवसाय (रोजगार) से अधिक लाभ, चतुष्पद का लाभ होता है। पश्चिम दिशा की यात्रा होती है और उससे वाहन, वस्त्र का लाभ होता है।।२३१।। लग्नादुपचये राहौ शुभग्रहयुतेक्षिते । मित्रांशेतुङ्गलाभेशे योगकारकसंयुते ।।२३२।। लग्न से उपचय (३।६।१०।११) भाव में राहु शुभग्रह से युत दृष्ट हो वा मित्रांश में वा उच्चांश में लाभ दशम के अंश में हो और योगकारक से युत हो तो।।२३२।। राज्यलाभं महोत्साहं राजप्रीतिं शुभावहाम् । गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिवर्धनम् ।।२३३।। राज्य का लाभ, उत्साह, और राजा से प्रेम होता है। गृह में कल्याण, सम्पत्ति, स्त्री पुत्र आदि की वृद्धि होती है।।२३३।। षष्ठाष्टमव्यये राहौ पापयुक्तेऽथवीक्षिते । चौरादिब्रणपीडाच सर्वत्र जनपीडनम् ।।२३४।। यदि राहु ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो चोर आदि से, फोड़ा- आदि से पीड़ा और परिवार के लोगों को कष्ट होता है।।२३४।। राजद्वारजनद्वेष इष्टबन्धुविनाशनम् । दारपुत्रादिपीडा च सर्वत्र जनपीडनम् ।।२३५।। राजकर्मचारियों से शत्रुता अभीष्ट बंधु का नाश होता है, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा और अपने लोगों को कष्ट होता है।।२३५।। द्वितीयद्यूननाथेतु सप्तमस्थानमाश्रितः । सदा रोगं महाकष्टं शांतिकुर्याद्यथाविधि । आरोग्यं सम्पदश्चैव भविष्यति न संशयः ।।२३६।। २।७ भाव का स्वामी हो और ७ वें भाव में बैठा हो तो सदा रोग और महाकष्ट होता है। इसकी शान्ति यथाविधि करने से आरोग्य और सम्पत्ति का लाभ होता है इसमें संशय नहीं।।२३६।।