बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें४८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथवा शत्रु राशि में पापयुत हो तो धन की हानि होती है कार्य में विघ्न, मानहानि, धन की हानि होती है।।२४३।। कलत्रपुत्रपीडा च हृद्रोगं राजकार्यकृत् । दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपिवा ।।२४४।। स्त्री-पुत्र को पीड़ा, हृदय का रोग होता है। दशेश से केन्द्र, कोण में हो वा एकादश वा धन स्थान में हो।।२४४।। दुश्चिक्ये बलसम्पूर्णे गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् । भोजनाम्बरपश्वादिदानधर्मजपादिकम् ।।२४५।। वा तीसरे भाव में हो बली हो तो गृह, क्षेत्र आदि की वृद्धि करता है भोजन, वस्त्र, पशु आदि का लाभ, दान, धर्म, जप आदि होते हैं।।२४५।। भुक्त्यंते राजकोपाच्च द्विमासं देहपीडनम् । ज्येष्ठभ्रातृविनाशं च भ्रातृपित्रादिपीडनम् ।।२४६।। अन्तर दशा के अन्त में २ मास शरीर में पीड़ा होती है। ज्येष्ठ भाई का नाश और भाई, पिता आदि को कष्ट होता है।।२४६।। दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा रिःफे वा पापसंयुते । तद्भुक्तौ धनहानिः स्याद्देहपीडा भविष्यति ।।२४७।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो उसके अन्तर में धन की हानि शरीर में पीड़ा होती है।।२४७।। द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति । स्वर्णस्य प्रतिमादानं शिवपूजां च कारयेत् । देहारोग्यं प्रकुरुते शांतिकुर्याद्विचक्षणः ।।२४८।। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु होती है। सुवर्ण की गुरु की प्रतिमा (मूर्ति) का दान और शिव की पूजा करने से शरीर आरोग्य होता है अतः शान्ति कराना चाहिये।।२४८।। अथराहुदशायांशन्यन्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वोच्चे मूलत्रिकोणे वा दुश्चिक्ये लाभराशिगे ।।२४९।। राहु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में वा अपने उच्च वा मूल त्रिकोण में वा तीसरे भाव में एकादशभाव में गये हुये।।२४९।।