बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 483, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८५ तद्भुक्तौ वाहनं सेवा राजप्रीतिकरं शुभम् । विवाहोत्सव कार्याणि कृत्वापुण्यानिभूरिशः ॥२५०॥ शनि के अन्तर में वाहन, नौकरी राजा से प्रीति होती है। विवाह आदि अनेक पुण्य कार्यों को मनुष्य करता है॥२५०॥ आरामकरणे दक्षो तडागं कारयिष्यति । शूद्रप्रभुवशादिष्टलाभं गोधनसंग्रहम् ॥२५१॥ बगीचा और तालाब बनाने को उत्सुक होता है। शूद्र स्वामी से गोधन का संग्रह॥२५१॥ प्रयाण पश्चिमेभागे प्रभुमूलाद्धनक्षयः । देहायासं फलाल्पत्वं स्वदेशे पुनरेष्यति ॥२५२॥ और लाभ होता है। पश्चिम दिशा की यात्रा से स्वामी द्वारा धन की हानि, देह में शिथिलता अल्पफल को प्राप्त हो पुनः स्वदेश को आता है॥२५२॥ नीचारिक्षेत्रगे मन्दे रन्ध्रे वा व्ययगेऽपिवा । नीचारिराजभीतिश्च दारपुत्रादि पीडनम् ॥२५३॥ यदि शनि नीच वा शत्रु गृह में हो वा ८।१२ भाव में हो तो नीचशत्रु और राजा से भय होता है और स्त्री-पुत्र को पीड़ा होती है॥२५३॥ आत्मबन्धुमनस्तापं दायादजनविग्रहम् । व्यवहारे च कलहमकस्माद्भूषणं लभेत् ॥२५४॥ आत्मीय बन्धुओं के मनमें सन्ताप और दायादों से शत्रुता होती है। व्यवहार में कलह और अकस्मात् आभूषण का लाभ होता है॥२५४॥ दायेशात्षष्ठरिःफे वा रन्ध्रे वा पापसंयुते । हृद्रोगं मानहानिश्च विवादः शत्रुपीडनम् ॥२५५॥ दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो हृदय का रोग, मानहानि, विवाद और शत्रु से पीड़ा होती है॥२५५॥ अन्यदेशप्रयाणं च गुल्मवद्व्याधिभागभवेत् । कुभोजनं कोद्रवादि जातिदुःखाद्भयं भवेत् ॥२५६॥ विदेश की यात्रा होती है। गुल्मरोग के समानव्याधि कोद्रव आदि कुत्सित भोजन और जातीय लोगों से दुःख का भय होता है॥२५६॥