बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९७ वाहनाम्बरपश्चादिगोधनैः संकुलं गृहम् । दायेशाद्भाग्यकोणे वा केन्द्रे वा तुङ्गगेऽथवा ।।२२।। वाहन, वस्त्र, पशु आदि से पूर्णता होती है। दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण स्थान में अपने उच्च में हो तो।।२२।। स्वदेशेधनलाभश्च पितृमातृसुखावहम् । गजवाजिसमायुक्तो राजमित्रप्रसादकः ।।२३।। स्वदेश में ही धन का लाभ, पिता माता को सुख हाथी-घोड़ा से युक्त और राजा से मित्रता होती है।।२३।। शुभदृष्टौ शुभैर्युक्तं दारसौख्यं धनागमम् । आदौ शुभं देहसौख्यं वाहनाम्बरलाभदम् ।।२४।। शुभग्रह से दृष्ट और युत हो तो देह सुख, वाहन, वस्त्र का लाभ होता है।।२४।। अन्तेतु धनहानिः स्यात्स्वात्मसौख्यं च जायते । महीसुतेन संदृष्टे शत्रुवृद्धिः सुखक्षयम् ।।२५।। अन्त में धन की हानि और आत्मसुख होता है। मंगल से दृष्ट हो तो शत्रुओं की वृद्धि और सुख की हानि होती है।।२५।। व्यवसायात्फलं नेष्टं ज्वरातीसारपीडनम् । दायेशात्षष्ठरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।।२६।। शुभदृष्टिविहीनश्चेद्धनधान्यपरिच्युतिः । विदेशगमनं चैव मार्गे चौरभयं तथा ।।२७।। दशेश से ६।८।१२ वें भाव में हो और पापग्रह से युत हो तो रोजगार में हानि, ज्वर और अतिसार से कष्ट होता है। शुभग्रह से न देखा जाता हो तो धन धान्य का नाश और बंधु मित्रों से विरोध, उद्योग की हानि देह में पीड़ा, स्वजनों को पीड़ा, बड़ा भय।।२६-२७।। व्रणदाहाक्षिरोगश्च नानादेशपरिभ्रमणम् । लग्नात्षष्ठाष्टरिःफे वा लाभे वा पापसंयुते ।।२८।। व्रण, दाह, नेत्र का रोग अनेक देशों का भ्रमण होता है। लग्न से ६।८।१२।११ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो।।२८।। अकस्मात्कलहश्चैव गृहे निष्ठुरभाषणम् । चतुष्पाज्जीवहानिश्च व्यवहारस्तथैव च ।।२९।।