भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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४९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । घर में अशुभ कार्य, नौकरों को कष्ट, गौ, भैंस आदि को कष्ट बन्धुओं से द्वेष होता है॥१४॥ दायेशात्केन्द्रकोणस्थे लाभे वा धनगेऽपिवा । भूलाभश्चार्थलाभश्च पुत्रलाभसुखंभवेत् ॥१५॥ दशेश से केन्द्र वा कोण वा लाभ वा धन स्थान में हो तो भूमि का लाभ, पुत्र का लाभ सुख॥१५॥ गोमहिष्यादिलाभश्च शूद्रमूलाद्धनं भवेत् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थेव्यये वा पापसंयुते ॥१६॥ गौ, भैंस का लाभ और शूद्र के द्वारा धन का लाभ होता है। दशेश से ६।८।१२ वें स्थान में पापग्रह से युत हो तो॥१६॥ धनधान्यादिनाशश्च बंधुमित्र विरोधकृत् । उद्योगभङ्गो देहार्तिः स्वजनानां महद्भयम् ॥१७॥ धन धान्य का नाश, बंधु मित्रादि से विरोध, उद्योगहीन, शरीर में कष्ट, और स्वजनों से भय होता है॥१७॥ द्विसप्तमाधिपे मंदे ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् । कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ॥१८॥ २।७ भाव का स्वामी शनि हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥१८॥ इसकी शान्ति के लिये विष्णु सहस्र नाम का जप काली गौ और भैंस का दान करने से आरोग्यता प्राप्त होती है॥१९॥ अथगुरुदशायां बुधार्न्तदशाफलम्- जीवस्यान्तर्गते सौम्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि दशाधिपसमन्विते ॥२०॥ गुरु की दशा में केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये अपने उच्च वा अपनी राशि में वा दशेश से युत बुध के अन्तर में॥२०॥ अर्थलाभं देहसौख्यं राज्यलाभं महत्सुखम् । महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥२१॥ धन का लाभ, अत्यंत सुख, राज्य का लाभ और देह का सुख महाराज की प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि सुख होता है॥२१॥