बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९५ इस दोष की शान्ति के लिये शिवसहस्र नाम का जप, रुद्राष्टाध्यायी का जप, गोदान करने से अभीष्ट की प्राप्ति होती है॥७॥ अथगुरुदशायांशनेरन्तर्दशाफलम्- जीवस्यान्तर्गते स्वोच्चे स्वक्षेत्रमित्रगे । लग्नात्केन्द्रत्रिकोणस्थे लाभे वा बलसंयुते ॥८॥ गुरु की दशा में अपने उच्च, अपने गृह वा अपने मित्र की राशि में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ में बलवान् शनि के अन्तर में॥८॥ राज्यलाभं महत्सौख्यं वस्त्राभरणसंयुतम् । धनधान्यादिलाभं च स्त्रीलाभं बहुसौख्यकृत् ॥९॥ राज्य का लाभ, महान् सुख, वस्त्र आभूषण का लाभ, धन धान्य का लाभ, स्त्री का लाभ अनेक सुख॥९॥ वाहनाम्बरपश्वादिभूलाभं स्थानलाभदम् । पुत्रमित्रादिसौख्यं च नरवाहनयोगकृत् ॥१०॥ वाहन, वस्त्र, पशु आदि तथा भूमि का लाभ और स्थान का लाभ होता है। पुत्र मित्र आदि का सुख और मनुष्य की सवारी का लाभ होता है॥१०॥ नीलवस्त्रादिलाभश्च नीलाश्वं लभते च सः । पश्चिमां दिशमाश्रित्य प्रयाणं राजदर्शनम् ॥११॥ नीले वस्त्र, नीले घोड़े का लाभ, पश्चिम दिशा की यात्रा और राजा का दर्शन॥११॥ अनेकयानलाभं च निर्दिशेन्मन्दभुक्तिषु । लग्नात्षष्ठाष्टमे मंदेव्यये नीचेऽस्तगेऽप्यरौ ॥१२॥ और अनेक प्रकार की सवारी का लाभ होता है लग्न से ६।८।१२ स्थान में शनि वा अस्त हो तो नीच वा शत्रु राशि में॥१२॥ धनधान्यादिनाशश्च ज्वरपीडा मनोरुजम् । स्त्रीपुत्रादिषु पीडा वा व्रणात्यादिकयुग्भवेत् ॥१३॥ धन धान्य का नाश ज्वर से पीड़ा-मानसिक कष्ट, स्त्री पुत्रादि को कष्ट व्रण का दुःख॥१३॥ गृहेत्वशुभकार्याणि भृत्यवर्गादिपीडनम् । गोमहिष्यादिहानिश्च बन्धुद्वेष्यो भविष्यति ॥१४॥