बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथगुरुदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्- स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । अनेकराज्याधीशश्च सम्पन्नो राजपूजितः ॥१॥ गुरु की दशा में अपने उच्च, अपनी राशि में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये गुरु के अन्तर में अनेक राज्यों का स्वामित्व सम्पन्नता और राजा से पूजनीयता॥१॥ गोमहिष्यादिलाभश्च वस्त्रवाहनभूषणम् । नूतनस्थाननिर्माणं हर्म्यप्राकारसंयुतम् ॥२॥ गौ, भैंस आदि का तथा वस्त्र आभूषण का लाभ होता है। नये स्थान का निर्माण गृह आदि का लाभ होता है॥२॥ गजान्तैश्वर्यसम्पत्तिर्भाग्यकर्मणिसंयुते । ब्राह्मणप्रभुसन्मानं समानप्रभुदर्शनम् ॥३॥ यदि गुरु भाग्य वा कर्म में हो तो हाथी आदि के ऐश्वर्य से युक्त॥३॥ स्वप्रभोः स्वफलाधिक्यं दारपुत्रादिलाभकृत् । नीचांशे नीचराशिस्थे षष्ठाष्टव्ययराशिगे ॥४॥ और अपने स्वामी से अधिक लाभ, स्त्री आदि का लाभ होता है। यदि गुरु नीचांश वा नीच राशि में ६।८।१२ भाव में हो तो॥४॥ नीचसङ्गं महादुःखं दायादजनविग्रहम् । कलहो न विचारोस्य स्वप्रभुह्यापमृत्युकृत् ॥५॥ नीचों की सङ्गति महादुःख, दायादों से विरोध, कलह, अपमृत्यु का भय॥५॥ पुत्रदारवियोगं च धनधान्यार्थहानिकृत् । सप्तमाधिपदोषेण देहवाधा भविष्यति ॥६॥ पुत्र स्त्री से वियोग, धन धर्म का नाश होता है। सप्तमेश होने से शरीर में रोग होता है॥६॥ तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् । रुद्रजाप्यं च गोदानं कुर्यादिष्टस्य प्राप्तये ॥७॥