भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९३ राहु की दशा में लग्न से लाभ वा त्रिकोण वा केन्द्र में शुभग्रह से अपने उच्च वा अपनी राशि में गये हुये भौम के अन्तर में ॥३०५॥ नष्टराज्यधनप्राप्तिः गृहक्षेत्राभिवृद्धिकृत् । इष्टदेवप्रसादेन सन्तानसुखभोजनम् ॥३०६॥ नष्टराज्य की प्राप्ति गृह क्षेत्र की वृद्धि होती है। इष्टदेव की प्रसन्नता से सन्तान का सुख, भोजन का सुख होता है॥३०६॥ क्षिप्रभोज्यान्महत्सौख्यं भूषणाम्बरलाभकृत् । दायेशात्केन्द्रकोणेवा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ॥३०७॥ शीघ्र भोजन महासुख, भूषण, वस्त्रादि का लाभ होता है। दशेश से केन्द्र वा कोण में वा तीसरे वा लाभ स्थान में हो तो॥३०७॥ रक्तवस्त्रादिलाभः स्यात्प्रयाणं राजदर्शनम् । पुत्रवर्गेषुकल्याणं स्वप्रभोश्च महत्सुखम् ॥३०८॥ लाल वस्त्रादि का लाभ, यात्रा और राजा का दर्शन, पुत्र वर्ग में कल्याण, महासुख॥३०८॥ सेनापत्यं महोत्साहं भ्रातृवर्गधनागमम् । दायेशाद्रिःफरंध्रे वा षष्ठे पापसमन्विते ॥३०९॥ सेनापतिपद का लाभ बड़ा उत्साह और भाइयों से धन का लाभ होता है। दशेश से १२।८।६ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो॥३०९॥ पुत्रदारादिहानिश्च सोदराणां च पीडनम् । स्थानभ्रंशं बंधुवर्गदारपुत्रविरोधनम् ॥३१०॥ पुत्र स्त्री की हानि, भाइयों को पीड़ा, स्थान भ्रष्ट, बंधुओं से तथा स्त्री, पुत्र से विरोध होता है॥३१०॥ चौरादिब्रणभीतिश्च सोदराणां च पीडनम् । आदौ क्लेशकरंचैवमध्यान्ते सौख्यमाप्नुयात् ॥३११॥ चौर तथा व्रण से भय और भाइयों को कष्ट होता है। अन्तर पहले कष्ट और मध्य तथा अन्त में सुख होता है॥३११॥ द्वितीयद्यूननाथेतु देहालस्यं महद्भयम् । अनड्वाहं च गांदद्याद्देहारोग्यं भविष्यति ॥३१२॥ यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो देह में आलस्य और बड़ा भय होता है। बैल और गौ का दान करने से आरोग्यता होती है॥३१२॥ इतिराहुदशायामन्तर्दशाफलम् ।