बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ज्योतिषशास्त्र सिद्धान्त संहिता और होरा नामक तीन स्कंधों में प्रसिद्ध है। यह वेद का प्रधान अङ्ग माना जाता है। उपर्युक्त तीनों स्कंधों में प्रतिपाद्य विषय स्वतन्त्र हैं। किन्तु सिद्धान्त स्कंध के आश्रित शेष दोनों स्कंध हैं। वेदों में, ब्राह्मण-ग्रन्थों में, श्रौत सूत्रों में, मीमांसा आदि दर्शनों में, पाणिनि सूत्रों में और पुराण-इतिहास में प्रसंगानुसार प्रयोजनवश ज्योतिष विद्या के अनेक प्रकीर्णक विषय सूत्ररूप से उपलब्ध हैं। इसके स्वतन्त्र विषय लगध मुन्युक्त (वेदाङ्गज्योतिष) नामक अति प्राचीन प्रसिद्ध ग्रंथ में प्रतिपादित हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक यज्ञादि और गृह्योक्त संस्कारों के अथवा धार्मिक आचारों के कर्तव्य के काल का ज्ञान ज्योतिष के ही ऊपर निर्भर माना गया है। इसी कारण वेद में काल के संवत्सर, अयन, ऋतु आदि विभाग और नक्षत्रों का दैवतक सम्बन्धादि प्राप्त होते हैं। इसका विशेष विवरण अथर्ववेद में कालक्रमानुसार चर्चा है। पंचभूतों के प्राकृतिक विभिन्न गुण-धर्मों से वेष्ठित भौतिक जगत् जड़ पिंड अपने अणु संसक्तावयवों से सदा स्पन्द क्रियाशील रहा करते हैं। मानस जीवन का अथवा स्थावर-जंगम विश्व के प्रत्येक वस्तु का परस्पर में दिव्य भौम एवं अन्तरिक्ष विविध उत्पात अर्थात् चेष्टाओं से प्रत्यक्ष-परोक्ष वशीकारक प्रभाव माना गया है और यही आरम्भ की भूमि है। तात्पर्य यह है कि विज्ञानानुमोदित प्राकृतिक अनुपात से अनुकूल क्रिया, प्रतिकूल अर्थात् शुभाशुभ ग्रह-नक्षत्रों के पिंडस्थ तत्त्व आकर्षण शक्ति द्वारा रश्मियों से प्रतिफलित होकर ऋतुधर्मानुसार अपने परिणामजन्य परिपाकों को प्राप्त हुआ करते हैं और इसका निदर्शन अन्य वस्तुओं की अपेक्षा सहज ही चेतन-पिंडों में अनुभूत होकर देखा जाता है। इस सूक्ष्म रहस्य की संगति अति कठिन है। आचार्य वराहमिहिर ने बृहत् जातक में लिखा है- होरेत्यहोरात्र विकल्पमेके वाञ्छन्ति पूर्वापरवर्णलोपात्। कर्मार्जितं पूर्वभवेसदादिं यत्तस्य पंक्तिं समभिव्यनक्ति ।।