भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 6

( ४ ) इसमें जन्मान्तरवाद अर्थात् जीवों के परिमाणवाद को आधार मानकर शुभाशुभ कर्म संस्कार का शरीर द्वारा भोग रूप से अभिव्यक्त होना प्रगट किया है। यहाँ मूलभूत अनिर्वचनीय सत्य फलित विद्या की सत्यता का एक मात्र स्तम्भ है। प्रत्येक नैसर्गिक घटना का कालज्ञान और आधाराधेय भाव से स्वरूप फल प्राप्तिः परिणामान्तर में स्थित होकर भिन्न स्वरूप में प्रगट होती है। इसी गूढ़ तत्त्व को ऋषि-मुनियों ने अपने दिव्य दृष्ट से जानकर परिभाषाओं के भेद से संसार को सूचित किया है। इससे भौतिक पदार्थों के सिवाय ग्रहों का मानवीय सम्बन्ध उपपत्ति सिद्ध होता है। यह निःसन्देह है कि वैदिक ज्योतिष तत्त्व का विकास ऋषि-मुनियों के समय से लेकर कालक्रमानुसार बढ़ता गया है और विभिन्न प्रकारों से इसकी उपयोगितां की परीक्षा करके वशिष्ठ, नारद, कश्यप, गर्ग आदि के संहिता- ग्रंथों की सृष्टि हुई। इसके अंग-उपांगों का आविष्कार समीकरण एवं उनके अनुयायी महाविशाल जाल भूपृष्ठ पर आकाश मध्य रेखा तक सीधा सम्बन्ध स्थापित करके ही छोड़ा और भविष्य में इनके अनुयायियों को वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, निग्रह आदि के सहारे कल्पना जालों को नवीन रूप देकर अनन्त की ओर प्रवृत्त होने के लिए पर्याप्त सामग्री छोड़ दी है। प्रस्तुत ग्रंथ भी उन्हीं ऋषियों में से एक आचार्य की कृति है। इसके अनेक संस्करण निकले हुए हैं। जिनमें परस्पर पाठभेद हैं। इसकी कतिपय पांडुलिपियाँ भी कई स्थानों में वर्तमान हैं। मैने उन्हीं पांडुलिपियों में से कुछ एक का सहारा लेकर इस ग्रंथ का संपादन यथामति भाषाटीका में सोदाहरण किया है। भ्रांति होना मनुष्य धर्म है। इस नीति के अनुसार सम्भवतः मुझसे भी कुछ भ्रांति और त्रुटि हो गई हो, अतः सज्जन विद्वत् गणों से करबद्ध प्रार्थना है कि उक्त त्रुटिओं के लिए क्षमा करते हुए मुझे सूचित करेंगे। संवत् २०२९ } विनीत : श्रा० शु० १५ } गणेशदत्त पाठक