बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२३ स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। बैल का दान और मृत्युंजय का जप कराना चाहिये।।४३।। अथ बुधदशायांराह्वन्तर्दशाफलम्- बुधस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे । कुलीरे मकरे वापि कन्यायां वृषभेऽपि वा ।।४४।। बुध की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में वा कर्क वा मकर वा कन्या वा वृष राशि में गये हुये राहु के अन्तर में।।४४।। राजसम्मानकीर्त्तिं च धनंधान्यं भविष्यति । पुण्यतीर्थस्थानलाभं देवतादर्शनं तथा ।।४५।। राजा से सम्मान, कीर्ति, धन धान्य का लाभ, पुण्यतीर्थ का लाभ, देवता का दर्शन।।४५।। इष्टापूर्त्ते च महतो मानश्चाम्बरलाभकृत् । भुक्त्यादौ देहपीडा च अंते सौख्यं विनिर्दिशेत् ।।४६।। यज्ञ और मान, वस्त्र का लाभ होता है। अंतर के आदि में देह पीड़ा और अन्त में सुख होता है।।४६।। लग्गाद्युपचये राहौ शुभग्रहसमन्विते । राजसंलापसन्तोषं नूतनप्रभुदर्शनम् ।।४७।। लग्न से उपचय (३।६।१०।११) स्थान में शुभग्रह से युक्त राहु हो तो राजा से सम्मान संतोष और नवीन स्वामी का दर्शन होता है।।४७।। षष्ठाष्टव्ययराशिस्थे तद्भुक्तौ धननाशनम् । भुक्त्यादौ देहनाशं च वातज्वरमजीर्णकृत् ।।४८।। यदि राहु ६।८।१२ भाव में हो तो उसके अंतर के आरम्भ में धन का नाश, देह का नाश, वात ज्वर अजीर्ण से होता है।।४८।। दायेशात्षष्ठरिःफेवा ह्यष्टमे पापसंयुते । निष्ठुरं राजकार्याणि स्थानभ्रंशोमहद्भयम् ।।४९।। दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो कड़े राजकार्य, स्थान की हानि, महाभय।।४९।। बंधनं रोगपीडा च आत्मबन्धु मनोव्यथा । हृद्रोगो मानहानिश्च धनहानिर्भविष्यति ।।५०।।