बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बंधन, रोगापीड़ा, आत्मीय बंधु को मानसिक कष्ट, हृदय रोग, धन की हानि, मानहानि और धनहानि होती है॥५०॥ द्वितीयसप्तमस्थे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गालक्ष्मीजपं चरेत् । श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यदायिनीम् ॥५१॥ २ वा ७ भाव में हो तो अपमृत्यु होती है। इस दोष की शान्ति के लिये दुर्गा लक्ष्मी का जप करना चाहिये और आयु और आरोग्यता को देने वाली श्वेत गौ और भैंस का दान करना चाहिये॥५१॥ अथ बुधदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्- बुधस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि लाभे वा धनराशिगे ॥५२॥ बुध की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा अपने उच्च वा अपनी राशि वा लाभ वा दूसरे स्थान में गये हुये गुरु के अन्तर में॥५२॥ देहसौख्यं धनावाप्तिं राजप्रीतिं तथैव च । विवाहोत्सवकार्याणि नित्यमिष्टान्नभोजनम् ॥५३॥ देहसुख, धन की प्राप्ति, राजा से प्रेम, घिवाहोत्सव, नित्य मिष्टान्न का भोजन॥५३॥ गोमहिष्यादिलाभं च पुराणश्रवणादिकम् । देवतागुरुभक्तिश्च दानधर्ममखादिकम् ॥५४॥ देवता गुरु में भक्ति, दान, धर्म, गौ, भैंस आदि का लाभ, पुराण आदि का श्रवण॥५४॥ यज्ञकर्मप्रवृद्धिं च शिवपूजाफलं तथा । दायेशात्केन्द्रकोणेवा लाभे वा बलसंयुते ॥५५॥ यज्ञ की वृद्धि शिवपूजन का फल होता है। दशेश से केन्द्र वा कोण वा लाभ स्थान में बली हो तो॥५५॥ बंधुपुत्रहृदुत्साहं शुभं शोभनसंयुतम् । पशुवृद्धियशोलाभमन्नदानादिकं फलम् ॥५६॥ बंधु पुत्र का सुख हृदय में उत्साह और शुभ फल, पशु वृद्धि, यश का लाभ, अन्न दानादि फल होते हैं॥५६॥