भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः ॥ ५२५ नीचे वास्तंगते वापि षष्ठाष्टव्ययगेऽपिवा । शन्र्यारफणिसंयुक्ते कलहोराजविग्रहम् ॥५७॥ यदि गुरु अस्त हो वा ६।८।१२ में हों शनि, भौम राहु से युक्त हो तो कलह, राजा से विरोध ॥५७॥ चौरादिदेहपीडा च पितृमातृविनाशनम् । दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ॥५८॥ चोर आदि से शरीर में पीड़ा पिता माता का नाश होता है। दशेश से ६।८।१२ में निर्बल हो तो ॥५८॥ अङ्गतापश्च वैकल्यं देहबाधा भविष्यति । कलत्रबंधुवैषम्यं राजकोपो धनक्षयः ॥५९॥ शरीर में ताप, अङ्ग में विकलता, देह में बाधा, स्त्री बंधु से बैर, राजकोप, धन की हानि ॥५९॥ अकस्मात्कलहाद्भीतिः प्रमादो राजविद्विषम् । द्वितीय सप्तमस्थे वा देहबाधा भविष्यति ॥६०॥ अकस्मात् कलह से भय प्रमाद से राजा से शत्रुता होती है। २।७ भाव में हो तो शरीर बाधा होती है॥६०॥ तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् । गोभूहिरण्‍यदानेन सर्वानिष्टं प्रणश्यति ॥६१॥ इस दोष के परिहार के लिये शिवसहस्रनाम का जप और गौ, भूमि, सोना के दान से सभी अरिष्ट नष्ट हो जाते हैं॥६१॥ अथ बुधदशायांशन्‍यन्तर्दशाफलम् - सौम्यस्यान्तर्गतेमन्दे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । त्रिकोणलाभगे वापि गृहे कल्याणवर्धनम् ॥६२॥ बुध की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण में वा लाभ में गये हुये शनि के अन्तर में गृह में कल्याण की वृद्धि॥६२॥ राज्यलाभं महोत्साहं गृहे गोधनसंकुलम् । शुभस्थानफलावाप्तिं तीर्थादौ भ्रमणं तथा ॥६३॥ राज्य का लाभ, अत्यंत उत्साह, गौ, धन की वृद्धि, शुभ स्थान की प्राप्ति, तीर्थ आदि में भ्रमण होता है॥६३॥