बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 528, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें५३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राजप्रीतिर्महोत्साहः कल्याणं च महत्सुखम् । महाराजप्रसादेन गृहभूम्यादिलाभकृत् ।।२४।। राजा से प्रीति बड़ा उत्साह, कल्याण और बड़ा सुख, महाराजा की प्रसन्नत से गृह-भूमि का लाभ।।२४।। भोजनाम्बरपश्वादि व्यवसायेऽधिकं फलम् । अश्ववाहनलाभश्च वस्त्राभरणभूषणम् ।।२५।। भोजन, वस्त्र, पशु आदि के व्यवसाय में अधिक लाभ होता है। अश्व वाहन का लाभ, वस्त्र आभूषण का लाभ।।२५।। देवालयतडागादिपुण्यधर्मादिसंग्रहम् । पुत्रदारादिसौख्यं च पूर्णचन्द्रस्तथैव च ।।२६।। देवालय तालाब आदि पुण्य धार्मिक कार्यों का संग्रह, पुत्र, स्त्री आदे का सुख पूर्णचंद्र के होने से होता है।।२६।। दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा बलसंयुते । कृषिगोभूमिलाभं च इष्टबन्धुसमागमम् ।।२७।। दशेश से केंद्र कोण वा लाभ में बलीचंद्र हो तो कृषि, गौ, भूमि का लाभ, इष्टबंधुओं का समागम।।२७।। तामसात्कार्यसिद्धिं च गृहे गोक्षीरमेव च । भूकृत्यं शुभमारोग्यं मध्ये राजप्रियंशुभम् ।।२८।। अंते तु राजभीतिं च विदेशगमनं तथा । दूरयात्रादिसञ्चारं सम्बंधिजनपूजनम् ।।२९।। तामसी प्रकृति से कार्य की सिद्धि और घर में गोदुग्ध का सुख भूमिसंबंधि कार्य, शुभ आरोग्यता मध्य में राजा से प्रेम, अंत में राजभय, विदेशयात्रा, दूर यात्रा की सम्भावना और संबंधियों का पूजन होता है।।२९।। नीचगे वा क्षीणगेचन्द्रे षष्ठाष्टव्ययराशिगे । आत्मसौख्यं मनस्तापं कार्यविघ्नं महद्भयम् ।।३०।। यदि चन्द्रमा क्षीण हो और ६।८।१२ भाव में हो तो अपने सुख में मन को सन्ताप, कार्य में विघ्न, महाभयं।।३०।। पितृमातृवियोगं च देहजाड्यं मनोव्यथाम् । व्यवसायात्फलं नष्टं गोमहिष्यादिनाशकृत् ।।३१।।