बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५३१ पिता माता का वियोग, देह में जड़ता, मन में व्यथा, व्यवसाय (रोजगार) में असफलता, गौ-भैंस की हानि होती है।।३१।। दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वां बलवर्जिते । धनधान्यादिहानिश्च मनोव्याकुलमेव च ।।३२।। दशेश से ६।८।१२ में निर्बल चन्द्र हो तो धन-धान्य की हानि, मन में व्याकुलता।।३२।। स्वबंधुजनशत्रुत्वं मातृपीडा तथैव च । निधनाधिप दोषेण द्विसप्ताधिपसंयुते ।।३३।। अपमृत्यु तस्य शान्तिं कुर्याद्यथाविधि । चन्द्रप्रीतिकरञ्चैव ह्यायुरारोग्य संभवम् ।।३४।। अपने बंधुओं से शत्रुता, भाइयों से पीड़ा होती है। अष्टमेश हो और २।७ भाव के स्वामी से युत हो तो अपमृत्यु का भय होता है। उसकी शान्ति के लिये चन्द्रमा के प्रसन्न होनेवाली और आयु आरोग्यता देनेवाली शान्ति करनी चाहिये।।३४।। अथकेतुदशायांभौमान्तर्दशाफलम्- केतोरन्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणभे । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे भौमे शुभदृष्टियुतेक्षिते ।।३५।। केतु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में वा अपने उच्च वा अपनी राशि में शुभग्रह से दृष्ट वा युत भौम के अन्तर में।।३५।। आदौ शुभफलं चैव ग्रामभूम्यादिलाभकृत् । धनधान्यादिलाभश्च चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।।३६।। पहले शुभफल, ग्राम, भूमि आदि का लाभ, धन, धान्य आदि का लाभ, चतुष्पद जीव का लाभ।।३६।। गृहारामक्षेत्रलाभं राजानुग्रह वैभवम् । भाग्यकर्मेशसम्बन्धे भूलाभं सौख्यमेव च ।।३७।। गृह, बगीचा, क्षेत्र का लाभ, राजा की कृपा से वैभव का लाभ होता है। भाग्येश कर्मेश से सम्बन्ध हों तो भूमि का लाभ और सुख होता है।।३७।। दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा । राजप्रीति यशोलाभं पुत्रमित्रादि सौख्यकृत् ।।३८।।