बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 530, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें५३२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । दशेश से केन्द्र वा कोण वा तीसरे वा लाभ में हो तो राजा से प्रेम, यश का लाभ; और पुत्र मित्र आदि का सुख होता है ॥३८॥ षष्ठाष्टमव्यये भौमे दायेशाद्धनगेऽपि वा । द्रुतं करोति मरणं विदेशेचापदं भ्रमम् ॥३९॥ यदि भौम ६।८।१२ स्थान में वा दशेश से २ स्थान में हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है॥३९॥ प्रमेहमूत्रकृच्छ्रादिचौराहिनृपपीडनम् । कलहादौ व्यथायुक्तं किंचित्सुखविवर्धनम् ॥४०॥ प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र आदि रोग, चौर-सर्प-राजा से पीड़ा, आदि में कलह और व्यथा तथा कुछ सुख की वृद्धि होती है॥४०॥ द्वितीयद्यूननाथे तु तापज्वर विषाद्भयम् । दारपीडामनःक्लेशमपमृत्युभयं भवेत् । अनड्वाहं प्रदद्यात्तु सर्वसम्पत्सुखावहम् ॥४१॥ २।७ भाव के स्वामी हों तो ताप ज्वर और विष का भय, स्त्री को पीड़ा, मन में क्लेश और अपमृत्यु का भय होता है। सभी सम्पत्ति और सुख प्राप्ति के लिये वृष का दान करना चाहिये॥४१॥ अथ केतुदशायांशन्यन्तर्दशाफलम्– केतोरन्तर्गते राहौ स्वोच्चे मित्रस्वराशिगे । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा दुश्चिक्ये धनसंज्ञके ॥४२॥ केतु की दशा में अपने उच्च वा मित्र के गृह वा अपनी राशि वा केन्द्र वा कोण वा लाभ वा तीसरे भाव में गये हुये राहु के अन्तर में ॥४२॥ तत्काले धनलाभः स्यात्संसारे भवति ध्रुवम् । म्लेक्षप्रभुवशात्सौख्यं धनधान्यफलादिकम् ॥४३॥ तत्काल धन का लाभ होता है, म्लेक्ष राजा के वश से सुख, धन-धान्य आदि का लाभ॥४३॥ चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्ग्रामभूम्यादिलाभकृत् । भुक्त्यादौ क्लेशमाप्नोति मध्यान्ते सौख्यमाप्नुयात् ॥४४॥ चतुष्पद जीव का लाभ, ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है। अन्तर के आरम्भ में कष्ट होता है मध्य और अन्त में सुख होता है॥४४॥