बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५३३ रंध्रे वा व्ययगे राहौ पापसंदृष्टिसंयुते । बहुपुत्रं कृशं देहं शीतज्वरविषाद्भयम् ।।४५।। यदि राहु ८।१२ भाव में पापग्रह से दृष्ट वा युत हो तो अनेक पुत्र होते हैं। शरीर में दुर्बलता, शीत ज्वर और विष से भय।।४५।। चातुर्थिकज्वरं चैव शूद्रोपद्रवपीडनम् । अकस्मात्कलहं चैव प्रमेहं शूलमेव च ।।४६।। चौथिया ज्वर, शूद्र के उपद्रव से पीड़ा, अकस्मात्कलह, प्रमेह और शूलरोग होता है।।४६।। द्वितीयसप्तमस्थे वा यदा क्लेशं महद्भयम् । तद्दोषपरिहारार्थं दुगदेवी जपं चरेत् । अयुतहोमश्च कर्त्तव्यः सर्वसौख्यप्रदायकः ।।४७।। द्वितीय वा सातवें हों तो महा क्लेश और महा भय होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ दुर्गा देवी का जप और सभी सुख को देने वाला अयुत होम कराना चाहिये।।४७।। अथकेतुदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्- केतोरन्तर्गते जीवे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापि लग्नाधिपसमन्विते ।।४८।। केतु की दशा में केन्द्र, लाभ वा त्रिकोण में वा उच्च वा अपनी राशि में वा लग्नेश से युत गुरु के अन्तर में ।।४८।। कर्मभाग्याधिपैर्युक्ते धनधान्यार्थसम्पदम् । राजप्रीतिं मनोत्साहमश्वांदोल्यादिलाभकृत् ।।४९।। अथवा कर्मेश भाग्येश से युत गुरु के अन्तर में धन, धान्य आदि सम्पत्ति का लाभ।।४९।। गृहे कल्याण सम्पत्तिं पुत्रलाभं महोत्सवम् । पुण्यतीर्थ मनोत्साहं सत्कर्म च सुखावहम् ।।५०।। गृह में कल्याण सम्पत्ति, पुत्रलाभ का उत्सव, पुण्यतीर्थ का दर्शन, मन में उत्साह, अश्व-पालकी का लाभ, राजा से प्रेम, अच्छे कर्म, सुख।।५०।। इष्टदेवप्रसादेन विजयं कार्यलाभकृत् । राजसंल्लापकार्याणि नूतन प्रभुदर्शनम् ।।५१।।