बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । इष्टदेव के प्रसाद से विजय, कार्य में लाभ, राजा से भाषण, और नूतन राजा का दर्शन होता है।।५१।। षष्ठाष्टमव्ययेजीवे दायेशान्नीचराशिगे । चौराहिब्रणभीतिं च धनधान्यादिनाशनम् ।।५२।। यदि गुरु दशेश से ६।८।१२ भाव में हो नीच राशि में हो तो चौर, सर्प, व्रण का भय, धन-धान्य आदि का नाश।।५२।। पुत्रदार वियोगं च अतीवक्लेशसम्भवम् । आदौ शुभफलं चैव अंते क्लेशकरं भवेत् ।।५३।। पुत्र-स्त्री का वियोग अत्यंत कष्ट की सम्भावना होती है। आदि में शुभफल होता है अन्त में कष्ट होता है।।५३।। दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्येलाभभेऽपिवा । शुभयुक्ते नृपप्रीतिर्विचित्राम्बरभूषणम् ।।५४।। दशेश से केन्द्र वा कोण में गुरु हो वा तीसरे वा लाभ स्थान में हो शुभग्रह से युक्त हो तो राजा से प्रीति, विचित्र वस्त्र आभूषण का लाभ।।५४।। दूरदेश प्रयाणं च स्वबन्धुजनपोषणम् । भोजनाम्बरपश्वादि भुक्त्यादौ देहपीडनम् ।।५५।। दूरदेश की यात्रा, बन्धुओं का भरण पोषण, भोजन, वस्त्र, पशु आदि का लाभ अन्तर के आदि में होता है।।५५।। अन्तेतु स्थानचलनमकस्मात्कलहो भवेत् । द्वितीयद्यूननाथेतु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।।५६।। अन्त में स्थान परिवर्तन अकस्मात् कलह होता है। दूसरे वा सातवें का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है।।५६।। तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् । महामृत्युंजय जाप्यं सर्वोपद्रवनाशनम् ।।५७।। इस दोष के परिहार के लिये शिवसहस्र नाम का जप और महामृत्युञ्जय का जप कराने से सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।।५७।। अथकेतुदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् - केतोरन्तर्गते मन्दे स्वदशायां तु पीडनम् । बन्धुक्लेशो मनस्तापश्चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।।५८।।