बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५३५ केतु की दशा में शनि के अन्तर में पीड़ा, बन्धु को कष्ट, मन में संताप चतुष्पद जीव का लाभ।।५८।। राजकार्यकलापेन धननाशं महद्भयम् । स्थानच्युतिः प्रवासश्च मार्गेचौरभयं भवेत् ।।५९।। राजकार्य के प्रसंग से धन की हानि, महाभय स्थान च्युति, प्रवास, मार्ग में चोरी का भय होता है।।५९।। आलस्यं मनसो हानिश्चाष्टमे व्ययराशिगे । मीनत्रिकोणगेमन्देतुलायांस्वर्क्षराशिभेऽपिवा ।।६०।। आठवें बारहवें भाव में हो तो आलस्य और मानसिक क्षति होती है। मीनराशि में त्रिकोण में वा तुला में वा अपनी राशि में शनि हो।।६०।। केन्द्रत्रिकोणलाभे वा दुश्चिक्ये वाशुभांशके । शुभदृष्टि च संप्राप्तौ सर्वकार्यार्थसाधनम् ।।३१।। वा केन्द्र, त्रिकोण, लाभ वा तीसरे भाव का शुभांशक में शुभग्रह की दृष्टि से युत हो तो सभी कार्य और धन का लाभ होता है।।६१।। स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं भ्रमणं रणलाभगम् । स्वग्रामे सुखसम्पत्तिः स्ववर्गे राजदर्शनम् ।।६२।। अपने स्वामी से सुख और रण प्रयुच्य भ्रमण लाभप्रद होता है। अपने ग्राम में सुख और सम्पत्ति अपने वर्ग और राजा का दर्शन होता है।।६२।। दायेशात्षष्ठरिःफे वा अष्टमे पापसंयुते । देहतापो मनस्तापः कार्ये विघ्नो महद्भयम् ।।६३।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो शरीर में ताप, मन में संताप, कार्य में विघ्न, महाभय।।६३।। आलस्यं मानहानिश्च माता पित्रो विनाशनम् । द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युभयं भवेत् ।।६४।। आलस्य, मानहानि और माता पिता का नाश होता है। दूसरे सातवें भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है।।६४।। तद्दोषपरिहारार्थं तिलहोमं च कारयेत् । कृष्णां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धिदाम् ।।६५।।