भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 800 में से

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अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५४३ मातृ का नाश, वड़ा, उत्साह राजा से प्रेम, होता है। अन्तर के आदि में ५ मास शुभफल, अंत में अजीर्ण से ज्वर का भय ।।३८।। कार्ये विघ्नमवाप्नोति सञ्चरेच्च मनोव्यथाम् । परं सुखं च सौभाग्यं महानिव समश्नुते ।।३९।। कार्य मे विघ्न और मानसिक कष्ट होता है। इसके बाद सुख, सौभाग्य, महाराज के समान होता है।।३९।। नैर्ऋतीं दिशमाश्रित्य प्रयाणं प्रभुदर्शनम् । यातुः कार्यार्थसिद्धिः स्यात्स्वदेशे पुनरेष्यति ।।४०।। नैर्ऋत्य दिशा की यात्रा और स्वामी का दर्शन, यात्रा में कार्य सिद्धि पुनः स्वदेश में आगमन।।४०।। उपकारो ब्राह्मणानां तीर्थयात्राफलं भवेत् । दायेशात्षष्ठराशिस्थे व्यये वा पापसंयुते ।।४१।। ब्राह्मणों का उपकार और तीर्थयात्रा का फल होता है। दशेश से ६।१२ स्थानं में पापग्रह से युत हो तो।।४१।। अशुभं लभते कर्म पितृमातृजनावपि । सर्वत्र जन विद्वेषं नानारूपादि संभवम् ।।४२।। पिता-माता आदि के अशुभ कर्मों की संप्राप्ति, सर्वत्र लोगों से विरोध अनेक प्रकार से कष्ट होते हैं।।४२।। द्वितीये सप्तमेवापि देहालस्यं विनिर्दिशेत् । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजय जपं चरेत् ।।४३।। २ वा ७ भाव में हो तो देह में आलस्य होता है। इस दोष के शान्त्यर्थं मृत्युंजय का जप करना चाहिये।।४३।। अथशुक्रदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम् - शुक्रस्यान्तर्गते जीवे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । दायेशाच्छुभराशिस्थे भाग्ये वा कर्मराशिगे ।।४४।। शुक्र की दशा में अपने उच्च, अपनी राशि में केन्द्र में दशेश से शुभराशि में भाग्य वा केन्द्र में गये हुये गुरु के अन्तर में।।४४।। नष्टराज्याद्धनप्राप्तिमिष्टार्थाम्बर सम्पदम् । मित्रप्रभोश्च सन्मानं धनधान्यपरांगतिम् ।।४५।।

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