बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वस्त्र, आभूषण भूमि आदि इष्टसिद्धि होती है यदि भौम लग्न से वा दशेश से ६।८।१२ भाव में हो तो।।३१।। शीतज्वरादि पीडा च पितृ-मातृ भयावहा । ज्वराद्यधिकरोगाश्च स्थानभ्रंशो मनोरूजा ।।३२।। शीतज्वर से पीड़ा और पिता-माता को भय, ज्वरादि अनेक रोग, स्थान नाश, मन में अशान्ति।।३२।। स्वबंधुजनहानिश्च कलहो राजविद्विषम् । राजद्वारजनद्वेषो धनधान्य व्ययाधिकम् ।।३३।। अपने बन्धुओं की हानि, कलह, राजा से और राज कर्मचारियों से द्वेष, धन धान्य का अधिक व्यय।।३३।। व्यवसायात्फलं नेष्टं ग्रामभूम्यादिहानिकृत् । द्वितीयद्यूननाथेतु देहबाधा भविष्यति ।।३४।। व्यवसाय से हानि और ग्राम भूमि आदि की हानि होती है। दूसरे वा सातवें भाव के स्वामी होने से शरीर में बाधा होती है।।३४।। अथ शुक्रदशायां राह्वन्तर्दशाफलम्- शुक्रस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभ त्रिकोणगे । स्वोच्चे वा शुभसंदृष्टे योगकारकसंयुते ।।३५।। शुक्र की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण वा अपने उच्च शुभग्रह से देखे जाते हुये योग कारक ग्रह से युक्त।।३५।। तद्भुक्तौ बहुसौख्यं च धनधान्यादिलाभकृत् । इष्टबन्धु समाकीर्ण भोजनाम्बर लाभदम् ।।३६।। राहु के अंतर में बहुत सुख, धन-धान्य वस्त्र का लाभ, इष्ट बंधुओं का समागम भोजन वस्त्र का लाभ।।३६।। यातुः कार्यार्थसिद्धिः स्यात्पशुक्षेत्रादिसंभवः । लग्नाद्युपचये राहौ तद्भुक्तिः सुखदा भवेत् ।।३७।। यात्रा से लाभ और कार्य की सिद्धि, पशु क्षेत्र आदि का लाभ होता है। लग्न से उपचय (३।६।१०।११) भाव में राहु हो तो इसका अन्तर सुखकर होता है।।३७।। शत्रुनाशो महोत्साहो राजप्रीतिकरा शुभा । भुक्त्यादौ शरमासांश्च अंते ज्वरमजीर्णकृत ।।३८।।