बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५४१ वा दशेश से ६।८।१२ राशि में हो तो तत्काल धन का नाश और बड़ा भय करता है॥२४॥ देहायासो मनस्तापो राजद्वारे विरोधकृत् । विदेशगमनं चैव तीर्थयात्रादिकं फलम् ॥२५॥ देह में परिश्रम, मन में संताप, राजद्वार से विरोध, विदेश यात्रा-तीर्थयात्रा, स्त्री-पुत्र आदि की पीड़ा, और आत्मीय बंधु से विरोध होता है॥२५॥ दारपुत्रादिपीडा च अत्मबंधुविरोधकृत् । दायेशात्केन्द्रलाभस्थे त्रिकोणे धनगेऽपिवा ॥२६॥ दशेश से केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण, दूसरे भाव में हो तो॥२६॥ राजप्रीतिकरं चैव देशग्रामाधिपत्यता । धैर्यं यशः सुखं कीर्तिर्वाहनाम्बरभूषणम् ॥२७॥ राजा से प्रीति देश-ग्राम की अधिपत्यता, धैर्य, यश, सुख-कीर्ति वाहन, वस्त्र आभूषण॥२७॥ कूपारामतडागादिनिर्माणं धनसंग्रहः । भुक्त्यादौ देह सौख्यं स्यादंते क्लेशकरंभवेत् ॥२८॥ कूंआं, बगीचा, तालाब आदि का निर्माण, धन का संग्रह होता है। अन्तर के आदि में शरीर सुख और अंत में कष्ट होता है॥२८॥ अथशुक्रदशायांभौमान्तर्दशाफलम्- शुक्रस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वर्क्षभे भौमे लाभेवा बलसंयुते ॥२९॥ शुक्र की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में वा उच्च वा स्वराशि में वा स्थान में बलवान्॥२९॥ लग्नाधिपेन संयुक्ते कर्मभाग्येश संयुते । तद्भुक्तौ राजयोगादिसंपदं शुभशोभनम् ॥३०॥ लग्नेश वा भाग्येश कर्मेश से युत भौम के अन्तर में राजयोग के सभी सुन्दर सम्पत्ति॥३०॥ वस्त्राभरणभूम्यादेरिष्ट सिद्धिः सुखावहा । षष्ठाष्टमव्यये वापि दायेशाद्वातथैव च ॥३१॥