भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 546

५८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । इष्टबंधुजनाकीर्णं विप्रप्रभुसमागमम् । स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं नित्यं मिष्टान्नभोजनम् ।।५९।। इष्ट बंधुओं का समागम तथा ब्राह्मण और स्वामी का समागम, महा सुख और नित्य मिष्टान्न का भोजन होता है।।५९।। दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते । पापदृष्टौ तथा युक्ते चतुष्पाज्जीवहानिकृत् ।।६०।। दशेश से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो और पाप दृष्ट वायुत हो तो चतुष्पद की हानि।।६०।। अन्यालयनिवासश्च मनोवैकल्यसम्भवः । व्यापारेषु तथा प्राज्ञं हानिरेव न संशयः ।।६१।। दूसरे के मकान में वास मन में विकलता, व्यापार में हानि होती है।।६१।। भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तं मध्ये सौख्यं विनिर्दिशेत्। अंते क्लेशकरं चैव शीतवातज्वरादिकम् ।।६२।। अन्तर के आदि में शुभफल मध्य में सुख और अन्त में कष्ट, शीत वात ज्वर होता है।।६२।। सप्तमाधीशदोषेण देहपीडा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकंजपेत् ।।६३।। सप्तमेश होने के दोष से शरीर में पीड़ा होती है। इसके शान्त्यर्थ विष्णु सहस्र नाम का जप करना चाहिये।।६३।। अथ शुक्रदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम् - शुक्रस्यान्तर्गते केतौ स्वोच्चे वा स्वर्क्षगेऽपिवा । योगकारकसम्बन्धे स्थानवीर्य समन्विते ।।६४।। शुक्र की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि वा योगकारक के संबंध युक्त वा स्थान बल से युक्त।।६४।। भुक्त्यादौ शुभमाधिक्यान्नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं गोमहिष्यादिवृद्धिकृत् ।।६५।। केतु के अन्तर में शुभफल की अधिकता से नित्य मिष्टान्न का भोजन, व्यवसाय से अधिक लाभ, गौ भैंस की वृद्धि।।६५।।