भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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पृष्ठ 547

अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५४७ धनधान्यसमृद्धिश्च संग्रामे विजयोभवेत् । भुक्त्यंते हि सुखं चैव भुक्त्यादौ मध्यमंफलम् ॥६६॥ धन धान्य समृद्धि का लाभ और संग्राम में विजय होती है। अंतर के अन्त में सुख और आदि में मध्यम फल।।६६।। मध्ये मध्ये महत्कष्टं पश्चादारोग्यमादिशेत् । दायेशाद्रिपुरंध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ॥६७॥ और मध्य में बीच बीच में महाकष्ट पीछे आरोग्यता होती है। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो।।६७।। चौराहिब्रणपीडा च बुद्धिनाशो महद्भयम् । शिरोरूजं मनस्तापमकस्मात्कलहं तथा ॥६८॥ चोर-सर्प, व्रण की पीड़ा, बुद्धि का नाश, महाभय, शिर में रोग, मन में संताप अकस्मात् कलह।।६८।। प्रमेहरोगसम्प्राप्तिर्नानामार्गे धनव्ययः । भार्यापुत्रविरोधश्च गमनं कार्यनाशनम् ॥६९॥ प्रमेह रोग की उत्पत्ति, अनेक मार्ग में धन व्यय, स्त्री, पुत्र के विरोध, यात्रा और कार्य की हानि होती है।।६९।। द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थ मृत्युंजय जपं चरेत् । छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ॥७०॥ २।७ भाव के स्वामी हों तो शरीर में कष्ट होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ मृत्युंजय का जप करना चाहिये और सभी सम्पत्ति को देनेवाला छाग का दान करना चाहिये।।७०।। इति पारशर होरायां पूर्वार्धे विंशोत्तरीमन्तर्दशा प्रकरणं समाप्तम्। अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । अथ प्रत्यन्तर्दशासाधनप्रकारः- स्वान्तर्दशाब्दवृन्दं च हन्यात्स्वाब्दैर्ग्रहस्य च । विंशोत्तरशतेनाप्तं दस्राः शेषं घट्यादिकम् ॥१॥ ग्रह के अन्तर्दशामान को ग्रह के दशा वर्ष संख्या से गुणाकर गुणनफल में