बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 555, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५५ नृपाल्लाभस्तथा मित्रान्पितृतो मातृतोऽपि वा । सर्वत्र लभते पूजां जीवजीवान्तरा रविः ।।४३।। (वृ.सू.) गुरु के अंतर में सूर्य के प्रत्यंतर में राजा से लाभ, मित्र, पिता, माता से लाभ और सर्वत्र पूजनीय होता है।।४३।। सर्वदुःखविमोक्षश्च मुक्तालाभो हयस्य च । सिध्यंति सर्व कार्याणि जीवजीवांतरे शशी ।।४४।। (वृ.चं.) गुरु के अन्तर में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में सभी दुःखों का नाश, मुक्ता और अश्व का लाभ और सभी कार्य सिद्ध होते हैं।।४४।। शस्त्रभीतिर्गुदे पीडावह्निमान्द्यमजीर्णता । पीडाशत्रुकृता भूरि जीवजीवान्तरे कुजः ।।४५।। (वृ.मं.) गुरु के अन्तर में भौम के प्रत्यंतर में शस्त्र का भय, गुदा में पीड़ा, अग्निमांद्य, अजीर्ण और शत्रु से अधिक पीड़ा होती है।।४५।। चांडालेन विरोधः स्याद्भयं तेभ्यो रतिग्रहः । कष्टं स्याद्व्याधिशत्रुभ्यो जीवजीवान्तरे तमः ।।४६।। (वृ.रा.) गुरु के अन्तर में राहु के प्रत्यंतर में चांडाल से विरोध और उनसे भय, व्याधि और शत्रु से कष्ट होता है।।४६।। इति गुरुप्रत्यंतरफलम्। अथ शन्यन्तरेशान्यादीनांप्रत्यन्तरफलम्- देहपीडा कलेर्भीतिर्भयमन्त्यलोकतः । विदेशगमनं दुःखं शनेः शन्यन्तरे शनिः ।।४७।। (श.श.) शनि के अन्तर में शनि के प्रत्यंतर में शरीर में पीड़ा, झगड़े का भय, नीचों से भय, विदेश की यात्रा और दुःख होता है।।४७।। बुद्धिनाशो कलेर्भीतिमन्नपानादिहानिकृत् । धनहानिर्भयं शत्रोः शनेः शन्यन्तरे बुधः ।।४८।। (श.बु.) शनि के अन्तर में बुध के प्रत्यंतर में बुद्धि का नाश, कलह का भय, अन्नादि की हानि, धन की हानि और शत्रु का भय होता है।।४८।। बन्धः शत्रुगृहे जातो वर्णहानिर्बहुक्षुधा । चित्तेचिन्ता भयं त्रासः शनेःसौरान्तरे शिखी ।।४९।। (श.के.) शनि के अन्तर में केतु के प्रत्यंतर में शत्रु गृह में बन्धन, तेज की हानि.