बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राहु की दशा में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में उद्वेग, कलह, चिन्ता, मानहानि, महाभय, पिता आदि के शरीर में विकलता होती है।।३६।। भगंदरकृता पीडा रक्तपित्तप्रपीडनम् । अर्थहानिर्महोद्वेगो राहो राह्वन्तरे कुजः ।।३७।। (रा.मं.) राहु के अन्तर में भौम के प्रत्यंतर में भगंदर रोग से पीड़ा, रक्त पित्त से पीड़ा, धन हानि और महा उद्वेग होता है।।३७।। इति राहु प्रत्यन्तर फलम् । अथ गुर्वन्तरे गुर्वादीनांप्रत्यंतर फलम्- हेमलाभो धान्यवृद्धिः कल्याणं च फलोदयः । बहुभाग्यं गृहे वृद्धिं जीवजीवान्तरे गुरुः ।।३८।। (वृ.शू.) गुरु के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में सुवर्ण का लाभ, धान्य वृद्धि, कल्याण, फलोदय अनेक प्रकार से भाग्योदय और घर में वृद्धि होती है।।३८।। गोभूमिहयलाभः स्यात्सर्वत्र सुखसाधनम् । संग्रहो ह्यन्नपानादि गुरुर्गुर्वन्तराशनिः ।।३९।। (वृ.श.) गुरु के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में गौ, भूमि, सुवर्ण का लाभ, सर्वत्र सुख का साधन, अन्न, पान आदि का संग्रह होता है।।३९।। विद्यालाभो वस्त्रलाभो ज्ञानलाभः समौक्षिकः । सुहृदां संगमः स्नेहो जीवजीवान्तराबुधः ।।४०।। (वृ.बु.) गुरु के अन्तर में बुध के प्रत्यन्तर में विद्या का लाभ, वस्त्र का लाभ, मौक्षिक ज्ञान का लाभ, मित्रों से समागम और स्नेह होता है।।४०।। जलभीतिस्तथा चौर्यं बंधनं कलहो भवेत् । अल्पमृत्युर्भयं घोरं जीव जीवांतरे ध्वजः ।।४१।। (वृ.के.) गुरु के अन्तर में केतु के प्रत्यंतर में जल से भय, चोरी का भय, बंधन, कलह, घोर अपमृत्यु का भय होता है।।४१।। नानाविद्यार्थसम्प्राप्तिर्हेमवस्त्रविभूषणम् । लभतेक्षेमसंतोषं जीवजीवांतरे कविः ।।४२।। (वृ.शु.) गुरु के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में अनेक प्रकार से धन का लाभ, सुवर्ण, वस्त्र, आभूषण का लाभ और कुशल, संतोष का लाभ होता है।।४२।।