भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 561

अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६१ अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । तत्रादौ सूक्ष्मांतरानयनप्रकारः- ग्रहवर्षेण संगुण्यं प्रत्यन्तरघटिकादिकम् । विंशोत्तरशतेनाप्तं सूक्ष्मान्तरदशामितिः ॥१॥ जिस ग्रह के प्रत्यंतर में जिस ग्रह का सूक्ष्मान्तर लाना हो उस ग्रह की दशा वर्ष से प्रत्यन्तर के (घटिकादिपिंडबनाकर) घटिकादि को गुणाकर गुणनफल में १२० का भाग देने से लब्धि घटिका और शेष को ६० से गुणाकर पुनः १२० का भाग देने से फल जो प्राप्त होता है इस प्रकार घटी-पल वा दिन (यदि घटी ६० से अधिक हो तो उसमें साठ से भाग देने से लब्धि दिन होता है) सूक्ष्म अन्तर होता है॥१॥ उदाहरण-जैसे सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्यादि ग्रहों का सूक्ष्मान्तर लाना है तो सूर्य का प्रत्यन्तर ५ दिन २४ घटी है। इसका पिड ५×६०+२४ = ३२४ घटी हुआ इसे सूर्य के दशावर्ष ६ से गुणने ३२४×६ = १९४४ हुआ इसमें १२० का भाग देने से लब्धि १६ घटी और शेष २४ को ६० गुणने से २४×६० = १४४० हुआ इसमें १२० का भाग देने से १२ पल हुआ अर्थात् सूर्य के प्रत्यंतर घटी पिंड को चन्द्रमा के दशा वर्ष १० से गुणनकर १२० का भाग देने से २७ घटी सूर्य के प्रत्यंतर में चंद्रमा का सूक्ष्मान्तर हुआ। इसी प्रकार सभी ग्रहों का सूक्ष्मांतर लाना चाहिये। अथसूर्यप्रत्यंतरे सूर्यादीनांसूक्ष्मन्तरदशाफलम्- नृणां भूमिपरित्यागो नियतं प्राणनाशनम् । स्थाननाशो महाहानिः सूर्यसूक्ष्मदशाफलम् ॥२॥ (सू.सू.) सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में मनुष्य को भूमि का त्याग करना पड़ता है, प्राण नाश की आशंका और स्थान का नाश होता है॥२॥ देवब्राह्मणभक्तिश्च नित्यकर्मरतस्तथा । सुप्रीतिः सर्वमित्रैश्च रवेः सूक्ष्मगते विधौ ॥३॥ (सू.चं.) सूर्य के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में देवता ब्राह्मण में भक्ति, नित्यकर्म में आसक्ति और सभी मित्रों से सुन्दर प्रेम होता है॥३॥ क्रूरकर्मरतिस्तिग्मशत्रुभिः परिपीडनम् । रक्तस्त्रावादिरोगश्च रवेः सूक्ष्मगते कुजे ॥४॥ (सू. मं.)